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रचनाकार से संवाद : मंटो को याद करने का मतलब

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आज हिन्दुस्तान की जनता के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोकतंत्र को बचा लेना है। देश की साझी संस्कृति और साझी विरासत को बचा लेना है। सहमति के साथ-साथ असहमति की संस्कृति को बचा लेना है। क्योंकि अब ये सारी चीजें विगत की यादें या कथा-आख्यान की चीजें बनने की सीमा तक पहुंच गई हैं।    आज भारतीय राजनीति भयानक संकट के दौर से गुजर रही है। सत्तारूढ़ पार्टी पूरे देश को एक खास रंग में रंगने की कवायद में एड़ी चोटी का पसीना एक किए हुए हैं। झूठ को एक शैली के रूप में विकसित किया जा रहा है। एक दूसरे के बीच राग और विश्वास को छीनकर , संदेह और भ्रम का माहौल बनाये जाने की पुरजोर कोशिश जारी है। ज्ञान , चिंतन और आलोचनात्मक विवेक की स्थली विश्वविद्यालयों को युद्ध-क्षेत्र में तब्दील करने की कवायद जोरों पर है। जेएनयू , हैदराबाद , बीएचयू के बाद अब एएमयू की बारी है। युवा वाहिनी की गुंडागर्दी को जिन्ना विवाद का नाम देकर पूरे देश में विश्वविद्यालय को बदनाम करने की नापाक कोशिश की जा रही है। अलीगढ विश्वविद्यालय विवाद के नाम पर चुनाव पूर्व बहुसंख्यक वोट के ध्रुवीकरण के इस शातिर खेल को देश की जनता अब समझने...

सिनेमा विमर्श : पहाड़ में कायांतरित होता आदमी : दशरथ माझी

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   पहाड़ पुरुष दशरथ मांझी के व्यक्तित्व ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि ज्ञान , बुद्धिमत्ता और गहन संवेदनशीलता सिर्फ औपचरिक शिक्षा की मोहताज नहीं। अक्षर की दुनिया से सर्वथा महरूम दिहाड़ी मजदूर दशरथ मांझी के अविश्वसनीय सामाजिक कर्म ही नहीं बल्कि समय-समय पर कहे गए उनके सूत्रा वचन ज्ञान-गरिमा से मंडित पंडितों और विद्वानों को भी चकित करने वाले हैं। इनमें कुछ सूत्रा वचनों का रचनात्मक उपयोग केतन मेहता ने उनके चरित्रा पर बनी फिल्म ‘ मांझी द माउंटेन मैन ’ में किया है। ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्थावान दशरथ मांझी कर्माें के प्रति ईश्वर पर भरोसा करने वालों के लिए सिनेमा के अंत में कहते हैं , ‘ भगवान के भरोसे मत बैठो क्या पता वह तुम्हारे भरोसे बैठा हो ’ । इन पंक्तियों का लेखक जब गहलौर गया तो गांव वालों ने बताया कि जब मांझी की सोहरत चारों तरफ फैल गयी थी तो एक पत्राकार के पूछने पर कि आप अपने बच्चों के लिए क्यों नहीं कुछ करते हैं तो उन्होंने कहा था कि ‘ पहाड़ काटकर जो रास्ता मैंने बनाया है उस रास्ते से जो भी गुजरेंगेे वे मेरे बेटा पुतोहु (बहू) होंगे। ’ वे बराबर कहते कि , ‘ मुझे कभी भी पह...