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रेडलाइट: वर्जित क्षेत्रक कथायात्रा

दीपिका झाक  कथा-संग्रह ' रेडलाइट ' मैथिली कथासाहित्य मे एकटा एहन वर्जित क्षेत्र मे प्रवेश करबाक साहस करैत अछि, जाहि विषय पर  सामान्यतया मैथिल समाज बातो कर'  नहि चाहैत अछि। वर्जित क्षेत्रसँ आशय ई  जे ओ एहन विषय सभ पर कथा लिखैत छथि जे समाज मे ' टैबू ' मानल जाइत अछि। एहि 'निषिद्ध' परिक्षेत्र मे दीपिका निधोक  प्रवेश करैत छथि। स्त्रीक मासिक धर्मक प्रसंग हो वा प्रेमहीन दाम्पत्य-रतिक प्रश्न, सेक्स वर्करक दुःखद गलीज जीवन हो वा लिव-इन रिलेशनशिप, बिनु बियाहे मातृत्व प्राप्त करबाक आकांक्षा हो अथवा परिवारक भीतर होइत यौन शोषण (Intrafamilial Sexual Abuse)—एहि सभ विषयकेँ ओ अपन कथाक केन्द्र बनबैत छथि। स्त्री-विमर्शक आधा-छिधा समझ केर आधार पर एहि कथा सभ केँ खारिज कऽ देब अथवा अनावश्यक कहि देब जतेक सरल, ओतबे कठिन एहि कथासभक प्रश्नसभ सँ मुठभेड़ करब, ओकर  अनिवार्यता बुझब आ ओकर मर्म धरि पहुँचब।   कारण ई जे संकलित कथा सभ एहन सार्वभौमिक विषय पर चर्चा नहि करैत अछि जाहिसँ कोनो व्यक्तिगत असुविधा  हो। गरीबी, लाचारी, विवाह दान, भ्रष्टाचार जेहन अपेक्षाकृत सुरक्षित विषय सभक बदला...

श्याम बेनेगल धुंधलके से उठती बेआवाज़ों की आवाज़

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चित्र के लिए साभार शब्दांकन    श्याम बेनेगल   ने हिंदी ही नहीं बल्कि   भारतीय फिल्म को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर वह ऊंचाई और सम्मान दिलाया है जिसकी कल्पना उनकी अनुपस्थिति में संभव नहीं थी। उन्होंने हिंदी फिल्मों के न सिर्फ कंटेंट को नए सिरे से परिभाषित किया बल्कि फॉर्म में भी यथोचित तोड़फोड़ की।   श्याम बेनेगल   से पहले समानांतर फिल्म की एक धारा अमूर्तन की ओर बढ़ चली थी। मणि कॉल (उसकी रोटी) और कुमार साहनी (माया दर्पण) जैसे कला फ़िल्मों के निर्देशकों में रूपवाद का प्रभाव   हावी होने लगा था। एनवक्त    श्याम बेनेगल   अंकुर ( 1974) निशांत ( 1975) मंथन ( 1976) भूमिका( 1977) आरोहण ( 1982) मंडी ( 1984 ) जैसी यथार्थवादी फिल्म लेकर आते हैं। इन फिल्मों के कारण कला फ़िल्मों के संदर्भ में रूप और विषयवस्तु के सापेक्ष मूल्य और उसके महत्व पर फिल्म समीक्षकों के बीच बहस शुरू हो गई थी।   श्याम बेनेगल   निर्देशित   फ़िल्मों में एक मजबूत वैचारिक आस्वाद के साथ कहने   की शैली ऐसी थी कि दर्शक उससे समीप्य महसूस करने लगे। समानांतर...