श्याम बेनेगल धुंधलके से उठती बेआवाज़ों की आवाज़
चित्र के लिए साभार शब्दांकन श्याम बेनेगल ने हिंदी ही नहीं बल्कि भारतीय फिल्म को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर वह ऊंचाई और सम्मान दिलाया है जिसकी कल्पना उनकी अनुपस्थिति में संभव नहीं थी। उन्होंने हिंदी फिल्मों के न सिर्फ कंटेंट को नए सिरे से परिभाषित किया बल्कि फॉर्म में भी यथोचित तोड़फोड़ की। श्याम बेनेगल से पहले समानांतर फिल्म की एक धारा अमूर्तन की ओर बढ़ चली थी। मणि कॉल (उसकी रोटी) और कुमार साहनी (माया दर्पण) जैसे कला फ़िल्मों के निर्देशकों में रूपवाद का प्रभाव हावी होने लगा था। एनवक्त श्याम बेनेगल अंकुर ( 1974) निशांत ( 1975) मंथन ( 1976) भूमिका( 1977) आरोहण ( 1982) मंडी ( 1984 ) जैसी यथार्थवादी फिल्म लेकर आते हैं। इन फिल्मों के कारण कला फ़िल्मों के संदर्भ में रूप और विषयवस्तु के सापेक्ष मूल्य और उसके महत्व पर फिल्म समीक्षकों के बीच बहस शुरू हो गई थी। श्याम बेनेगल निर्देशित फ़िल्मों में एक मजबूत वैचारिक आस्वाद के साथ कहने की शैली ऐसी थी कि दर्शक उससे समीप्य महसूस करने लगे। समानांतर...