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विमर्शक बारह मास : महत्वपूर्ण अंतरविषयी पुस्तक

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                          मैथिली मे वैचारिक पोथीक भारी अकाल रहल अछि। एहि अकालक कारण कें ताकब कठिन स' बे सी असुविधाजनक । मैथिली मे आलोचना , समीक्षाक दरिद्र्य एही वैचारिकताक अभाव मे निहित अछि। एहि दृष्टियें  साहित्यकार विभूति आनंद आ इतिहासकार अयोध्यानाथ झाक संयुक्त संपादन मे प्रकाशित पोथी   ' विमर्शक बारह मास ' अत्यंत उत्साहजनक अछि। मैथिली मे कदाचित एहन पुस्तक नहि छल। संप्रति अंतरविषयी अध्ययन कें बहुत महत्व देल जाइछ। ' विमर्शक बारह मास ' सुच्चा आ विलक्षण गुणवत्तापूर्ण अंतरविषयी पुस्तक अछि।   एकर संपादक द्वय स्वयं अंतर्विषयी छथि। एहि पुस्तक मे बारह विषय मे देल गेल विस्तृत एकल व्याख्यान कें लिप्यंतरित कए पुस्तक तैयार कयल गेल अछि। ई व्याख्यान व्यवस्थित , सुनियोजित आ सुचिंतित   तरीका सँ अपन-अपन क्षेत्रक विशेषज्ञ सँ कराओल गेल छल। बारहो विषयक शीर्षके पढ़ि पुस्तकक सार्थकता आ अर्थवत्ताक अनुमान लगाओल जा सकैछ।   तिरहुतिया मंदिर , पनिया अकाल , मिथिला मे कबीरक धमक , कबिर काने क , किरिसि करिए मन लाए , देसिल ब...

श्याम बेनेगल धुंधलके से उठती बेआवाज़ों की आवाज़

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चित्र के लिए साभार शब्दांकन    श्याम बेनेगल   ने हिंदी ही नहीं बल्कि   भारतीय फिल्म को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर वह ऊंचाई और सम्मान दिलाया है जिसकी कल्पना उनकी अनुपस्थिति में संभव नहीं थी। उन्होंने हिंदी फिल्मों के न सिर्फ कंटेंट को नए सिरे से परिभाषित किया बल्कि फॉर्म में भी यथोचित तोड़फोड़ की।   श्याम बेनेगल   से पहले समानांतर फिल्म की एक धारा अमूर्तन की ओर बढ़ चली थी। मणि कॉल (उसकी रोटी) और कुमार साहनी (माया दर्पण) जैसे कला फ़िल्मों के निर्देशकों में रूपवाद का प्रभाव   हावी होने लगा था। एनवक्त    श्याम बेनेगल   अंकुर ( 1974) निशांत ( 1975) मंथन ( 1976) भूमिका( 1977) आरोहण ( 1982) मंडी ( 1984 ) जैसी यथार्थवादी फिल्म लेकर आते हैं। इन फिल्मों के कारण कला फ़िल्मों के संदर्भ में रूप और विषयवस्तु के सापेक्ष मूल्य और उसके महत्व पर फिल्म समीक्षकों के बीच बहस शुरू हो गई थी।   श्याम बेनेगल   निर्देशित   फ़िल्मों में एक मजबूत वैचारिक आस्वाद के साथ कहने   की शैली ऐसी थी कि दर्शक उससे समीप्य महसूस करने लगे। समानांतर...