ऋतुराज की कविता : ज़िन्दगी के अधूरेपन का महात्म्य
ऋतुराज कवि हैं , कवि से पहले एक संवेदनशील मनुष्य हैं और उनकी संवेदनशीलता विकास के द्रुतगामी रथचक्र में पीछे... बहुत पीछे छूट गए वैसे लोगों के प्रति है जिनकी नागरिकता आज खतरे में है| जिन्हें अब सपने आने भी बंद हो गए हैं| अधूरापन जिनकी नियति है | ऋतुराज की कविता ऐसे लोगों को संबोधित है जो बस जिये जा रहे हैं, जिनकी जीने की चाहत बस आज का दिन निपट जाने तक सिमट गया है | ये ऐसे बेघर लोग हैं, जिनसे सरकार घर ही नहीं जमीन की रसीदें भी मांग रही है| ये कवि के ‘अपने लोग’ हैं- बिल्कुल अकलुषित और बेजान ये मेरे लोग धरती बसाते हैं पर अभी तक भी उजड़े हैं वक्त का सैलाब इन्हें घोंसले-सा काटकर निकल गया है इनकी आँखों में बेघर होने का खालीपन है (अपने लोग , पुल पर पानी, 1981, राजकमल प्रकशन, पृष्ठ 49) कवि के ऐसे फटेहाल ‘अपने लोग’ आज के ‘शाइनिंग इंडिया’...