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अपने अपने नामवर

  हिन्दी दुनिया में सबके अपने-अपने नामवर सिंह हैं| किसी के पास थोड़ा अधिक तो किसी के पास थोड़ा कम| एक-दूसरे से अलग-अलग नामवर| थोड़ा-थोड़ा नामवर सिंह सबको चाहिए| और सभी उस नामवर को अपने पास बचा कर, सहेजकर रखना चाहते हैं| एक नामवर सिंह राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी आदि के पास हैं तो दूसरे विश्वनाथ त्रिपाठी, निर्मला जैन तथा खगेन्द्र ठाकुर आदि के पास| एक नामवर सिंह विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और रामबहादुर राय के पास हैं तो दूसरे अरुण कमल, सदानंद साही और रविभूषण के पास| एक नामवर सिंह जगदीश्वर चतुर्वेदी के पास हैं तो पुरुषोत्तम अग्रवाल के पास भी हैं| एक नामवर सिंह इतिहासकार भगवान जोश, लालबहादुर वर्मा, समाजशास्त्री आनंद कुमार, मराठी लेखक गोविन्द पुरुषोत्तम देशपाण्डे, भालचंद्र नेमाडे, उडिया लेखिका प्रतिभा राय, अंग्रेजी लेखक हरीश त्रिवेदी आदि न जाने कितनी अलग-अलग भाषाओं और अलग अनुशासनों के विद्वानो के हैं| हिन्दी में तो कदाचित ही कोई लेखक या शिक्षक हो जिनके पास थोड़ा-थोड़ा नामवर सिंह न हों| भारतीय भाषाओं के साहित्य में किवदंती बन चुके आलोचक नामवर सिंह इन सबों के पास हैं| किन्हीं के पास अच्छे नामवर है...

महामारी की त्रासदी से जूझती कविता

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  मानव सभ्यता और महामारी के आपसी रिश्ते का इतिहास कितना पुराना है कहना कठिन है| पूर्व में महामारी का आतंक इतना भीषण और त्रासदपूर्ण   था कि लोग इसे ईश्वरीय अभिशाप के रूप के रूप में देखते थे| अभी भी गाँवों में चेचक को ‘देवी’ की संज्ञा दी जाती है| महामारी की विनाशलीला को मनुष्य-जाति ने बहुत करीब से देखा है और अपनी आंखों के सामने गाँव-दर-गाँव   को उजड़ते हुए भी| श्मसान में लाशों को जलाने और दफनाने के लिए न जगह मिल पाती थी न ही इस कार्य के लिए लोग ही मिल पाते थे। महामारी के आगे मनुष्य की लाचारी और बेचारगी ने साहित्य को भी अपनी ओर आकर्षित किया। संपूर्ण विश्वसाहित्य में   महामारी की त्रासदपूर्ण गाथा को केंद्रित कर एक से एक   साहित्यिक रचनाएं हुई है, जिनमें कामू का प्लेग विश्व प्रसिद्ध उपन्यास के रूप में जाना जाता है। फासीवादी उभार के बीच महामारी की मार और समाज की हृदयहीनता को समझने के प्रयास ने इस उपन्यास को श्रेष्ठतम उपन्यास का दर्ज़ा दिलाया| कोलंबिया के प्रसिद्ध लेखक ग्राबिल गार्सिया मार्खेज के उपन्यास लव इन द टाइम ऑफ़ कोलरा में प्रेम और यातना की संघर्षकथा को अद्भुत...