आलोचक से संवाद : मैं कठघरे में खड़ा एक मुजरिम हूँ : नामवर सिंह
आलोचना के शिखर पुरूष नामवर सिंह की झोली में
यश-अपयश में किसका पलड़ा भारी है, कहना मुश्किल है। लेकिन मजे की बात यह
है कि नामवर सिंह के धु्र विरोधी भी ‘किन्तु’, ‘परन्तु’ लगाकर
ही सही उन्हें ‘बड़ा आलोचक’
मानते
हैं। ‘वाद-विवाद-संवाद’ के रस में पगे नामवर सिंह के लिए अरूण
कमल के शब्दों में ‘‘पूरे वातावरण को स्फूर्ति से भरे हुए, जाफरानी
की खुशबू से तर किए, भोर
की तन्द्रा के दोपहर की गहमाहमी में बदलते, आपको हमेशा अपने
चैवों पर तैयार रहने के लिए बाध्य करते, बेचैनी और तड़प से भरते, द्वंद्व
के लिए ललकारते, कभी निःशस्त्र
करते, कभी वार चूकते। डाॅ0 नामवर सिंह हमारे सबसे बड़े
संवादक रहे हैं।’1 अगर
आप अपने युग के सबसे बड़े संवादक हैं तो आपसे शिकायतें भी लाजमी है। तभी तो सुधीश
पचैरी कहते हैं ‘‘आप हर सूरत में अनिवार्य हैं, हर
सूरत में प्रासंगिक हैं, हर सूरत में विवादी हैं, इसलिए
आपसे सबसे ज्यादा शिकायते हैं’’2
अगर शिकायतों की फेहरिश्त बनायी जाए तो ‘नामवर के प्रति
शिकायत कोश’ तैयार हो जाए। जिस निर्मल वर्मा के लिए वे कहीं
भी कभी भी कठघर में खड़े कर दिए जाते हैं, उन्होंने कहा ‘नामवर सिंह
साहित्य के धर्मक्षेत्र को राजनीति का करूक्षेत्र बनाना चाहते हैं,’ अशोक
वाजपेयी ने उन्हें ‘अचूक अवसरवादिता का आलोचक’ घोषित
किया तो राजेन्द्र यादव ने ‘तकड़मी आलोचक’ कहा। कहा गया ‘नामवर
में ‘कान्सिटेन्सी नहीं है, वे अपने विचार बदलते रहते हैं तो किसी
ने कहा वे राजनीति का विमर्श करते है, सत्ता का डिसकोर्स’।
इन सारी शिकायतों को आप मन्द-मन्द मुसकाते सुनते हैं और कहते हैं ‘‘ मैं
कठघरे में खड़ा एक मुजरिम हँू।’’3
तुम्हीं से मुहब्बत तुम्हीं से लड़ाई
साक्षात्कार
या संवाद अन्य सभी विधाओं से अलहदा विधा है| अन्य सभी विधाओं में आप अपनी मर्जी के
मालिक होते है। ‘मैं चाहे ये
लिखूँ मैं चाहे वो लिखूँ मेरी मर्जी!’ अपनी कलम है और अपना कागज। किसी के बाप
का क्या जाता है ? लेकिन साक्षात्कार में तो चक्रव्यूह रचा जाता
है। साक्षात्कार लेने वाला और साक्षात्कार देनेवाला अपनी पूरी तैयारी के साथ
जंग-ए- मैदान में उतरते हैं। व्यूह रचना की पूरी तैयारी और दक्षता के साथ।
सजो-सामान से लैस। अब अगर पीच पर बैट्समैन
के रूप में सचिन हो तो दुनिया का कोई भी गेंदबाज क्यों न हो, पसीने
तो छूटेंगे ही। मजेदार साक्षात्कार वही बन पाता है जहाँ पक्ष-प्रतिपक्ष में भिंडत
हो, कांटे की टक्कर, टैंग आॅफ वार’। ‘कहना न होगा’ कि इसी वैचारिक
भिंडत से कुछ ‘नया’ कुछ ‘सुन्दर’ और
कुछ बेहतर ‘विकल्प’ निकल आते हैं।
आप यह समझने की भूल न करें कि ये पक्ष-प्रतिपक्ष एक दूसरे के दुश्मन होते हैं,
ये
एक दूसरे के मित्र होते हैं, ‘होना-सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’
वाला
भी नहीं। लेकिन उस क्षण विशेष में वे एक दूसरे के लिए पराक्रमी योद्धा ही होते
हैं। अन्य साक्षात्कार में यह बात लागू हो या न हो किन्तु नामवर सिंह का
साक्षात्कार तो साहित्य-संस्कृति का वह अखाड़ा है जिसे संगीत की शब्दावली में कहें
तो लड़ंत-भिडंत वाला धु्रपद गायन का आनंद आपको वहाँ मिलेगा। इस अखाड़े में अकेला घुसना कई बार मुफीद नहीं होता। इसलिए नामवर सिंह के अधिकांश साक्षात्कार में
प्रतिपक्ष टोली में जाते हैं। वार पर वार
और नामवर सिंह अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह के सारे दरवाजे को तोड़ते, सबको
ध्वस्त करते, सबको परास्त करते, कभी-कभी स्वयं
पछाड़ खाते, अंततः विजयी
मुस्कान के साथ पान के बीड़े से अपने मुख को सुशोभित करते आपको मिल जायेगे।
नामवर सिंह के साक्षात्कार में ‘मुहब्बत’ और ‘लड़ाई के द्वंद्व
से जो संवाद निर्मित हुआ है, वह साहित्य की
समझ को दुरूस्त करने वाला सिद्ध हुआ है।
नामवर
सिंह अपने साक्षात्कार में ‘मुँह दखौअल’ बात नहीं करते।
इस संदर्भ में वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने साक्षात्कार के संबंध में जो बाते
कहीं हैं, वे नामवरजी पर चैबीस कैरेट सही हैं, ‘‘साक्षात्कार में
सच कहने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। जहाँ जीवन की अश्लीलता को शालीनता की
चादर से ढककर जीने को ही सभ्यता माना जाता है, वहाँ बड़े लोगों
के बारे में सच कहने-सुनने की आदत कैसे होगी? यही वजह है कि
हिन्दी में ‘ठकुर सुहाती’ साक्षात्कार की
भरमार दिखाती है। साक्षात्कार होने वाले
को आग को आग और पानी को पानी कहने का अपार साहस चाहिए।’’ नामवर सिंह ऐसे
विरल आलोचक हैं जिनमे यह साहस आपादमस्तक है। वे
अपने साक्षात्कार में किसी को नहीं बकसते, स्वयं को भी
नहीं।
लैबोको एकु न दैबेको दोऊ
नामवर
सिंह अपने साक्षात्कार में अत्यंत निर्मम होते हैं। प्रिय से प्रिय व्यक्ति, , बड़े से बड़े
लोगों की आलोचना करने में हिचकाते नहीं है, स्पष्ट और दो
टूक। क्योंकि उन्हें किसी से कुछ न लेना
है न किसी को कुछ देना है। गुरू तुल्य
आलोचक राम विलास शर्मा हों या अपने समय को सबसे बड़े कवि अज्ञेय, कद्दावर
कथाकार कमलेश हों या मुँहफट्ट कथाकार राजेन्द्र यादव, सहयोगी मित्र
मैनेजर पाण्डेय हो या प्रिय शिष्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, उनकी आलोचना की
जद से कोई बच नहीं पाता। सबसे बड़ी बात है कि उनकी उंगली सही जगह चली ही जाती है। अज्ञेय की कविता में रूपवाद की अतिशता केा रेखांकित
करते हुए कहते है ’’उनके यहाँ तो यह समस्या बहुत उग्र रूप में
है।..... उनकी कविताओं को देखें, यहाँ
तक कि उनकी सबसे अच्छी कविताओं को भी, तो आपको उनमें
एक खास ढंग मिलेगा कविता लिखने का..... यानी कविता लिखने का एक यान्त्रिक तरीका है
उनका आप कह सकते हैं कि उनकी ज्यादातार कविताओं का एक खास फार्मूला है मसलन उनकी
यही कविता लीजिए, ‘’हम नदी के द्वीप हैं’’ तो पहले यह
पंक्ति उनके दिमाग में आती है और फिर नदी के द्वीप के इस बिंब से जुड़ी हुई जितनी
चीजें है, जितने दृश्य, जितना साजोसामान है, वह
इस कविता में सजा लेते हैं और जब कविता पूरी होती है तो अन्त की पंक्ति में जैसे
यह बता रहे हैं कि यहाँ यही सिद्ध करना था और इस तरह कविता पूरी हो गयी।’’4
नामवरजी की आलोचना में कइयों ने पूर्वाग्रह की नोटिस ली है, किन्तु गंभीरता
से देखें तो ऐसा नहीं है। प्रकाश मनु को दिए इसी साक्षात्मकार में वे अज्ञेय के
गद्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, ‘‘ ‘शेखर एक जीवनी’ तो मास्टर पीस
है। यहाँ तक की उनकी कुछ कहानियाँ इतनी अच्छी हैं कि आप उन्हें कभी भूल ही नहीं
सकते। उनके कुछ चिन्तापरक निबंध भी बहुत अच्छे हैं। आप उनके विचारों से असहमत हो
सकते हैं, पर उनकी शक्ति का आपको कायल होना पड़ता है।’’5 कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव की कहानियों के
बारे में उन्होंने बहुत सख्त टिप्पणी की है, ’’ कमलेशवर तो तब
भी घटिया लेखक थे, आज भी है। वे कहानीकार नहीं हैं, वे जर्नालिस्ट
थे। तब भी वे जर्नालिस्ट और आज भी
हैं। राजेन्द्र यादव की ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’ भी एकदम फार्मूले की कहानी है। नाम भी लक्ष्मी
रखा है। श्लेश का चमत्कार, राजेन्द्र की, ‘खेल खिलौने’
में
भी यही है। मैंने राजेन्द्र पर बड़ी सख्त टिप्पणी उस दौर में की है।6 बड़ी बात यह है कि इतनी सख्त टिप्पणियों के
बावजूद दोनों घनिष्ठ मित्र रहे। राजेन्द्र यादव ने भी जब भी मौका मिला नामवर सिंह
को क्या क्या नहीं कहा। बजाप्ता ‘हंस’ में नामवर सिंह
के विरोध में कई लेख प्रकाशित हुए। लेकिन उस पीढ़ी की उदारता कहनी चाहिए कि इस तरह
के घात-प्रतिघात का व्यक्ति संबंधों पर असर नहीं पड़ता था। अशोक वाजपेयी को नामवर
सिंह ‘देह और गेह’ का कवि कहते रहे, एक
समय में भारत भवन का बहिष्कार किया, किन्तु मित्रता की डोर कभी कमजोर नहीं
पड़ी। राजेन्द्र यादव से ही बातचीत करते हुए उन्हेांने उन्हीं की पुस्तक ‘काश
मैं राष्ट्रदोही होता’ को बहुत खराब किताब कहा, ‘‘अच्छी
किताब का सवाल नहीं है, वह किताब को खराब ही है।’’7
नामवर
सिंह राजेन्द्र यादव पर सर्वाधिक नाराज तब हुए थे जब उन्होंने अलका सरावगी के
उपन्यास, कलिकथा वाया बाईपाश’ को साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिलवाने
में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस पर राजेन्द्र यादव की टिप्पणी थी ‘मध्यवर्गीय
औपनिवेशिक मानसिकता के कलावाद के लिए
आॅक्सीजन...’ सामान्यता वे सवंाद में धैर्य नहीं खोते।
किन्तु इस टिप्पणी पर राजकुमार राकेश को उन्होंने कहा, ’’राजेन्द्र यादव
अपनी समझ से बड़ा प्रसन्न होंगे कि एक चुस्त फिकरा लिख लिया है। लेकिन यही चुस्त
फिकरा उनकी चिर संचित मूर्खता और अज्ञानता का हिमालय है।’’ (सम्मुख, पृष्ठ-31)
आलोचक
मैनेजर पाण्डेय के प्रति उनके मन में बहुत आदर है। ’आलोचना’ में
सात्यिेतिहास पर कई विलक्षण निबंध उन्होंने पाण्डेयजी से लिखवाया। मैनेजर पाण्डेय
को उन्होंने ‘आलोचकों का आलोचक‘ कहा किन्तु उनकी
आलोचना दृष्टि की सीमाओं को बताते हुए परमानन्द श्रीवास्तव, अरविन्द
त्रिपाठी और लीलाधर मंडलोई के साथ बातचीत करते हुए कहा है, ’’रचनात्मक
साहित्य की समीक्षा में उन्होंने अभी तक
कोई विशिष्ट उदाहरण पेश नहीं किया है। छिटपुट कुछ लिख देना और बात है। मेरी
जानकारी में उन्होनंे अब तक मीमांसा ही की है। साहित्य का समाजशास्त्र लिखा है।
व्यवहारिक आलोचना से भिड़ना उन्हें लगता है गवारा नहीं है।’’8 इसी तरह
उन्होंने पुरूषोतम अग्रवाल को अपने कई साक्षात्कारों में मेधावी शिष्य घोषित किया
है, कहीं कहीं संभावनाशील आलोचक भी। किन्तु उनकी आलोचना की मूल सीमाओं को
उदघाटित करते हुए अपने इसी साक्षात्कार में कहा है, ’’पुरूषोत्तम ने
कुछ कृतियों पर भी समीक्षाएँ लिखी है। लेकिन पुरूषोत्तम आलोचकों की उस कोटि के हैं
जो ‘इण्टलेक्चुअल या ‘बौद्धिक’ कहलाना ज्यादा
पसंद करते हैं। लगता है कि साहित्य उनके लिए बड़ी छोटी चीज है। वे संस्कृति पर
विचार ज्यादा करते हैं। साहित्य पर कम ............ इसलिए उन्हें टेक्सट में रमना,
रस
लेना और डूबना सुहाता नहीं (इन दोनों (मैंनेजर पाण्डेय) आदमियों को देख-पढ़कर नहीं
लगता कि ये लोग कभी कविताएँ पढ़ते हैं, कभी कहानियाँ, उपन्यास भी पढ़ते
हैं। हमेशा बौद्धिक विमर्श में डूबे प्रतीत होते हैं। ये लोग भी सर्जनात्मक साहित्य
पढ़ते हैं जब उन्हंे उस पर कहीं लिखना हो। महज लिखने के लिए आलोचक की किताब पढ़ना और
शेष को कभी न पढ़ना आलोचक की मजबूरी ही कही जायेगी। ..... एक अच्छा आलोचक वह है जो
सबको देखता पढ़ता है। चुन कर पढ़ता है, उनमें से सबसे कम चुनकर लिखता है। जब
आप साहित्य के अच्छे पाठक नही बन सकते तो फिर अच्छे आलोचक कैसे बन पायेंगे ?
कृतियों
में डूबकर, रम कर रस लेना और न अच्छा लगे तो यह साफ-साफ
लेखक, पाठक से कहना कि यह कमी है। यह तभी संभव है, जब आप रचनात्मक
साहित्य केा लगातार चैकन्ने होकर पढ़ेंगे।’’9 यही कारण है शुक्ल, द्विवेदी
और रामविलास शर्मा के बाद वे विजयदेवनारायण साही, मलयज, मुक्तिबोध
और विष्णु खरे को ही महत्वपूर्ण आलोचक मानते हैं।
लिखतं को आगे वकतं की प्रतिष्ठा
नामवर सिंह से जितने लोगों ने बातचीत की हैं,
उनमें
लगभग सभी ने उन पर यह आरोप लगाया है कि अब आप लिखते नहीं केवल बोलते हैं। उन्हें
खुद इस बात का मलाल रहा है। लेकिन विलक्षण वक्तृत्व कला और बेहिसाब लोकप्रियता ने
उनके लेखक रूप को ढक सा दिया है।
अरविन्द
त्रिपाठी ने एक बातचीत में आशोक वाजपेयी, विष्णुखरे, राजेन्द्र यादव,
कृष्ण
बलदेव वैद के हवाले उनसे कहा कि ‘‘ अनेक लोगों ने इस बात की शिकायत की है
कि नामवरजी लिखने से बचने के लिए वाचिकता में चले गए हैं क्योंकि लिखने पर ‘आॅन
द रिकार्ड’ आने के बाद कई मुसीबतंे आ जाती हैं’’ इन सवालों का जबाब जिस तार्किता से नामवर सिंह ने दिया है,
वह
प्रतिपक्षियों को लाजबाब कर जाता है।
सर्वप्रथम
तो उन्होंने यह कहा कि ‘‘ हिन्दी में लेखन का मतलब सिर्फ किताब
लिखना लगाया जाता है। कई पश्चिमी देशों में, जहाँ आलोचना
काफी समृद्ध है, श्रेष्ठ आलोचनात्मक लेखन पहले पत्रिकाओं में
होता है। पिछले बीस वर्षों में आलोचना में साठ लेख लिखे हैं, (एक
दूसरे साक्षात्कार में उन्होंने संपादकीय लगाकर 92
आलेख की बात की हैं)’’10 आगे उन्होंने अपने आलोचना कर्म के
उद्देश्य को उद्घाटित करते हुए कहा, ‘‘आलोचना मैंने हिन्दी में हस्तक्षेप के
रूप में की है। जहाँ जरूरी लगा साहित्य में जो चल रहा है, उसमें मैं
हस्तक्षेप करूँ, बदलूँ, साहित्य की किसी धारा को या प्रवृति
को। कोई नई चीज उभर रही है, उसकी उपेक्षा हो रही है तो उस पर बल
दूँ। सार्थक आलोचना वही होगी, वरना केवल गं्रथों को प्रकाशित करते
जाने और लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाने के लिए आलोचना नहीं की।11
आलोचना
की मौखिक परंपरा की सार्थकता पर उन्होंने नितांत नये सिरे से विचार किया है। आलोचना
विधा तक सामान्य पाठकों की पहुँच अत्यल्प हो पाती है। आजकल तो सर्जनात्मक साहित्य
भी आम पाठक से बहुत दूर हो चला है। ऐसे समय में प्रश्नों, समस्याओं और
साहित्य विवेक के विस्तार में गोष्ठियों का महत्व असंदिग्ध है। नामवर सिंह ने
अरविन्द त्रिपाठी को इस संदर्भ में बताया कि ‘‘मेरे सामने इन
सबके ऊपर जो तात्कालिक चुनौती है, जिस दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें महज
लिखकर लोगों तक पहुँचना कठिन हो गया है। मैं किताबों के जरिये कितने लोगों तक पहुँच सकता हँू, इस
दौर में मैंने अकेले, पाठकों से कई गुना ज्यादा श्रोता तैयार किए
हैं। भाषण या वार्तालाप के दौरान एक खास उपलब्धि यह होती है कि कई बार श्रोताओं से
रूबरू होते हुए मेरी कई चीजें अपने आप साफ हो जाती हैं जो पुस्तक लिखते वक्त हमें
उलझाए रहती हैं। नामवर सिंह की समझ में हिन्दी भाषा समाज में जहाँ साक्षरता
और शिक्षा की स्थिति अच्छी न हो वहाँ
लेखक का अधिसंख्य समूह तक पहुँच
पाना आसान नहीं। इसलिए दूसरों तक पहुँचने
के लिए दूसरे रास्ते भी ढूँढने पड़ेगे।13
नामवर
सिंह ने अपने उक्त महत्वपूर्ण साक्षत्कार में विश्व में भाषणों, वार्तालापों
की उपलब्धियों को बताते हुए कहा कि ‘प्लेटों के डायलाॅग्स’ से
भला कौन अपरिचित होगा ? अनेक
दार्शनिक हुए है जिन्होंने सिर्फ लेक्चर्स दिए हैं। ऐसे दार्शनिकों में बिटगेसटाइन
का नाम बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े दार्शनिक के रूप में लिया जाता है। उनकी सबसे
महत्वपूर्ण पुस्तक ‘फिलोसोफिक्ल इन्वेस्टीगेशन’ में
सिर्फ उनके दिए गए लेक्चर्स का संकलन है।14
नामवर सिंह इस संदर्भ में हमेशा कहते रहे हैं कि वे लोग भाग्यशाली थे
जिन्हें भाषणों ( और वर्ग कक्षाओं) के
नोट्स लोगों ने तैयार किए और बाद में वे पुस्तकाकार प्रकाशित हुए।’ जिस
समय वे यह बात कह रहे होंगे कदाचित उन्हें यह मालूम न रहा हो कि भविष्य उन्हें भी ‘भाग्यशाली’
बनाने
वाला है। खगेन्द्र्र ठाकुर (आलोचक के मुख से) और आशीष त्रिपाठी ने उनके भाषणों,
संवादों
और वार्तालापों का प्रकाशन करवाया है। निकट भविष्य में राजकमल प्रकाशन से ही उनके कक्षानोट्स
(भारतीय काव्यशास्त्र) भी प्रकाशित होने
वाले हैं। उनके अंतिम सत्र के विद्यार्थी द्वय मधुप कुमार और शैलेश कुमार इस
महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम देने में लगे हैं। अब यह भविष्य बताएगा कि उनके
प्रकाशित कक्षा नोट्स और भाषण संवाद आदि कितने लोकप्रिय हो पाते हैं।
लाखों
के बोल सहे सितमगर तेरे लिये
नामवर
सिंह मुख्यतः कविता के आलोचक माने जाते हैं किन्तु उनके अधिकांश संवाद, बातचीत
अथवा साक्षात्कार कहानियों पर केन्द्रित हैं। इसका कारण यह है कि यहाँ ‘वाद-विवाद
संवाद8 की गंुजाईश अधिक है। साथ ही मसाला
भी। क्योंकि नई कहानी के दौर में अकेले नामवर सिंह ने त्रिगुट कथाकार कमलेश्वर, मोहन राकेश और
राजेन्द्र यादव के बरअक्स निर्मल वर्मा को स्थापित कर दिया था। कहानी पर हुए संवाद
का अधिकांश हिस्सा इसी घोर विवादास्पद मुद्दे को लक्षित कर किया गया है। नामवर
सिंह के इस स्टंैड के खिलाफ चैतरफा आक्रमण शुरू हो गया था जो आज तक जारी है।
किन्तु नामवर सिंह न उन दिनों हिले न बाद
में टस्स से मस्स हुए। यद्यपि निर्मल वर्मा का रूझान जैसे-जैसे एक खास तरह की
भारतीयता और अध्यात्म की तरफ होता गया, नामवरजी के विचार भी उनके प्रति बदले।
निर्मल
की कहानियों पर मुख्यतः विदेशी परिवेश का आरोप लगता रहा है। कथा आलोचक विजय मोहन
सिंह ने जब निर्मल वर्मा की कहानियों पर यही आरोप चस्पां किया तो सधे खिलाड़ी की
तरह नामवार सिंह ने मोर्चा संभालते हुए कहा, ‘‘ मैं फिर कहूँगा
कि परिवेश महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण वह मानवीय संवेदना है। फिर
यह मानवीय संवेदना.........चाहे जहाँ से भी आये। यह विडंबनापूर्ण स्थिति नहीं है
कि निर्मल अपने लेखों में भारतीयता का जिक्र करते हैं और कहानियों में विदेशी
परिवेश होता है। प्रश्न यह है कि कहानी के केन्द्र में कौन मनुष्य है। भारतीय या
अभारतीय। परिवेश नहीं भी हो, वह मन कौन सा है। वह मन यदि सचमुच आज
के भारतीय मनुष्य की चिंताओं से, प्यार से, विसंगति से,
विडंबना
से ... विंधा हुआ है ... और वह कहानी में व्यक्त होता है तो मेरे निकट वहीं महत्वपूर्ण है। नितांत
भारतीय परिवेश को लेकर लिखी और रची कहानी अभारतीय हो सकती है।’’15
एक
दूसरे साक्षात्कार में प्रकाश मनु ने निर्मल वर्मा की कहानियों में ‘समय
की अनुपस्थिति’ का सवाल उठा दिया तो नामवर सिंह ने कहा कि,
‘‘जो
समय की बात आपने कही, यह इसलिए कोई कसौटी नहीं हो सकती कि कोई समय
जरूरी नहीं कि सब पर एक जैसा असर डाले। यह लेखक के व्यक्तित्व पर बहुत कुछ निर्भर
करता है। किसी पर हो सकता है कि ऊपर ऊपर उसका असर हो और किसी दूसरे पर ऊपर से बिल्कुल न दिखाई देनेवाला कोई
ऐसा प्रभाव जो भीतर बिन्दु की शक्ल में हो, लेकिन कहानी में
कहीं ज्यादा मारक और प्रभावी रूप में चला आये तो निर्मल वर्मा की यह कोई कमजोरी है,
मैं
ऐसा नहीं मानता’’16 दरअसल नामवार सिंह के तूणीर में निर्मल
वर्मा के खिलाफ बोलने वालों के लिए कइएक ब्रह्मास्त्र हैं और बचाव के लिए मजबूत
ढाल। राजकुमार राकेश से बातचीत करते हुए उन्होंने
यहाँ तक कहा कि हमें गर्व है कि हमारे बीच निर्मल वर्मा जैसा कहानीकार हुआ
है। वे थोड़ा आवेशित होते हुए अपनी रौ में
कहने लगें ’’लाख कहे, मोहन राकेश,
कमलेश्वर
और राजेन्द्र यादव जैसे लोग-वह इनसे बड़ा और महत्वपूर्ण है। यह सब लोग उनके बराबर
टिक नही सकते। यह मैं तब भी मानता था, और अब भी मानता हँू। ‘परिन्दे’
को
नई कहानी का पहला संग्रह मैंने सोच समझकर कहा था, आवेश में नहीं।
आज भी मैं मानता हँू कि यह त्रिगुट कहानी को हाइजैक करना चाहता था।’’17
मौसम
की तरह तुम भी बदल तो न जाओगे।
नामवर
सिंह के बारे में उनके आलोचकों का एक बड़ा आरोप यह है कि उनके विचार बदलते रहते
हैैं। आज जिस मत की स्थापना डंके की चोट पर करते हैं, कुछ दिनों के
बाद डंके की दुगुनी चेाट से उसी मत का खंडन कर देते हैं। बनारसी ढब में आ गए तो
मामूली और साधारण रचनाकारों को भी ‘निराला’ बना देंगे और
अपनी जादुई वक्तृत्व से अच्छी से अच्छी रचना को भी दो कौड़ी का सिद्ध कर देंगे -‘राई को पर्वत
करे पर्वत राई माहि’ ही तो नामवरी है।
नामवर
सिंह पर आरोप है कि वे एक समय रामविलास शर्मा को केवल जलती मशाल कहा तो बाद में
उनकी ‘शव साधना’ भी कर दी। ‘छायावाद’ पुस्तक लिखते समय छायावादी कविता में
गुण ही गुण नजर आये, किन्तु ‘कविता के नये
प्रतिमान’ तक आते-आते छायावादी कविता बेचारी हो गयी। एक समय में भारत भवन की कला संस्कृति की
प्रशसंा करते नहीं अघाते किन्तु बाद में भारत भवन की पूरी संस्कृति पाखंडी नजर आने
लगी। भारतीय उपन्यास को ‘किसान जीवन की महागाथा’ कहा
किन्तु उल्लेखनीय उपन्यासों के रूप में ‘कसप’
और ‘नौकरी
की कमीज’ ही सामने आये। कभी कट्टर माक्र्सवादी तो सभी संशोधनवादी माक्र्सवादी
आदि, आदि। लेकिन नामवर सिंह जब अपने ऊपर लगे इन आरोपों पर बहस करने लगते
हैं तो प्रतिपक्ष वकील के पास निरन्तर होने के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं बचता।
विस्तार भय से यहाँ एक दो खंडन को ही जगह मिल पायेगी।
विचार
परिवर्तन ‘‘चिन्तन के क्षेत्र में, साहित्य के
क्षेत्र में मैं समझता हँू कि ये गुण है। वे समझते हैं कि दोष है। रचनात्मक
साहित्य को देखिए। सृजन का धर्म ही है -नवाचार, पुनर्नवता। कुछ
नया करना। नहीं तो यह सृजन नहीं है और आप
अपने को ही दोहराते चले जा रहे हैं। ‘रामचन्द्र शुक्ल
संचयन’ की भूमिका में मैंने लिखा है कि ‘कविता क्या है ’
लेख
उन्होंने 1909 में ‘सरस्वती’ में लिखा था,
उसे
विचार विथी में 1930 में बदल दिया। रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य
का इतिहास जिस रूप में नागरी प्राचारिणी सभा से 1928 में छपवाया उसे 1941 में बदल
दिया। रामविलास जी के बारे में मैंने उनकी
प्रशंसा भी की है और उनकी आलोचना भी अभी मैंने की है और आगे भी उनकी प्रशंसा
करूंगा और आलोचना भी। जो अच्छा है वह खोद-खोदकर निकालंेगे। और मुझे पूरा हक है कि
जैसे यह दुनिया अच्छी भी लगती है, बुरी भी लगती है जो अच्छा लगेगा,
उसे
अच्छा कहूँगा, जो बुरा लगेगा बुरा कहँूगा। इस पर मुझे कोई
अवसरवादी कहता है तो शौक से कहे’’19
माक्र्सवाद
संबंधी नामवर सिंह की दृष्टि भी लीक से हटकर है। यही वजह है कि उग्र
माक्र्सवादियों को वे संशोधनवादी लगते हैं। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘माक्र्स
ने खुद अपने जमाने के माक्र्सवादियों को पढ़कर कहा था कि अगर यही माक्र्सवाद है तो मैं माक्र्सवादी नहीं हँू। इसलिए जो लोग माक्र्सवाद
को धर्मग्रंथ समझते है, जो ‘केपिटल’ को कुरान समझते
हैं तो उनकी समझ होगी कि माक्र्सवाद की एक ही व्याख्या हो सकती है। मैं माक्र्स की
रचनाओं को कुरान या बाइबिल नहीं समझता... माक्र्सवाद मरेे लिए नानार्थ
संभावनाओं का ‘टेक्सट’ है।
साहित्य की जैसी व्याख्या आप चाहे कर सकते हैं, वह पवित्र
धर्मग्रंथ नहीं जिसकी एक ही व्याख्या हो। यही नहीं माक्र्स की ‘क्रिटिक
आॅफ क्रिटिकल क्रिकिट’ एक बात बात में बात है। आलोचनात्मक आलोचना की
आलोचना । इसलिए मैं तो स्वयं अपने विचारों की आलोचना लगातार करता हँू। जहाँ मैंने
समझा कि यह ठीक नहीं, कल जो कहा था, आज मैं गलत काट
सकता हँू और मुझे कोई संकोच नहीं होगा।’’21
अगर
कीर्ति का फल चखना है आलोचक को खुश रखना है
चूँकि
नामवर सिंह साहित्य के आलोचक हैं, इसलिए उनकी आलोचना संबंधी मान्यताओं से
साक्षात्कार करना जरूरी है। अब देंखे कि
आलोचना जैसे गंभीर कर्म को व्याख्यायित करने के लिए उन्होंने फूटपाथ से शब्दावली
का चयन किया। आॅटो रिक्शा के पीछे लिखा होता है, ‘देखो मगर प्यार
से’। महावीर अग्रवाल के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने कहा,’’ आलोचक
का धर्म है -कृतियों को बहुत ध्यान से पढ़ना, डूबकर पढ़ना।
सटीक विश्लेषण और व्याख्या करके रचना के अन्तःकरण तक पहुँचना। अपने साथ पाठक को भी
भीतर तक पहुँचाना। बुनियादी चीज है नई या पुरानी रचनाओं को रस लेकर पढ़ना। रचना को,
पुस्तक
को प्यार से देखना जरूरी है। यह बुनियादी चीज है, जिससे आलोचना
पैदा होती है।’’ प्रत्येक आलोचक अपने संघर्ष और अपनी साधना से
ही अपने सच को अर्जित करता है।’’22
नामवर
सिंह एक बड़े आलोचक का दायित्व प्रचलित कैनन (परम्परा) पर विचार करना और जरूरत हो
तो उस कैनन को बदल देना मानते हैं। वीरेश चन्द्र को दिए अपने साक्षात्कार में कहते
हैं, इलियट ने ठीक ही कहा है कि युगों बाद किसी साहित्य में बड़ा आलोचक आता
है जो उसके इतिहास को ‘पुनव्र्यवस्थित’ करता है। इलियट
ने रिआर्डरिंग शब्द का प्रयोग किया है। व्याख्या करने वाले आलोचक तो आते ही रहते
हैं, लेकिन इतिहास को बदल देने का काम करने वाले विरले ही आते हैं।
माक्र्स ने भी यही कहा था ‘‘दार्शनिकों ने अभी तक संसार की तरह
-तरह से व्याख्या भर की है, जबकि असल काम तो है उसे बदलना।25 हिन्दी में कैनन पर विचार करने वाले और उसे
बदलने वालों में नामवर सिंह के अनुसार मिश्रबंधु (हिन्दी नवरत्न), रामचन्द्र
शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा हंै। उन्होंने अपने
साक्षात्कार में इन आलोचकों के कैनन निर्माण की प्रक्रिया को भी स्पष्ट किया है।
अपने बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि ‘‘फिलहाल अपनी
भूमिका के बारे में सिर्फ इतना ही कहना काफी है कि अभी तक मैंने कैनन निर्माण की
प्रक्रिया में दो या तीन छोटे-छोटे हस्तक्षेप किए हैं। नई कविता के अंदर मुझे
अज्ञेय और उनके मंडल के कवियों से भिन्न एक दूसरी परंपरा का अहसास तो 1956-57 से
ही था और मैं यह महसूस करता था कि उस दूसरी परंपरा की सबसे समर्थ प्रतिभा
मुक्तिबोध हैं। इस आशय के दो छोटे-छोटे लेख मैंनें तभी लिखे थे लेकिन उसे
व्यवस्थित रूप दिया 1968 में प्रकाशित ‘कविता के नए प्रतिमान’ में
जिसके केन्द्र में ‘अंधेरे में’ जैसे ‘फंतासी’
वाली
लंबी कविताओं के रचियता मुक्तिबोध थे।26 इसी क्रम में उन्होंने त्रिलोचन की तलाश
और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को बताया।’‘इस
पुस्तक के द्वारा सिर्फ यह कहने की कोशिश की गई है कि हमारे इतने लंबे इतिहास में
अनेक परंपराएँ हैं और उनके बीच टकराव और सामंजस्य की प्रक्रिया निरंतर चलती रही
है। इसलिए किसी एक परंपरा को मुख्य धारा में2 स्थापित करने का अर्थ है अन्य
परम्पराओं का दमन। यद्यपि नामवर सिंह ने अपनी
आरंभिक पुस्तक ‘छायावाद’ को कैनन निर्माण
में नहीं रखा, किन्तु उनका पहला कैनन निर्माण, ‘छायावाद’
से
ही आरंभ हो गया था। उन्होनंें दालित- विमर्श’ और
स्त्री-विमर्श को भी कैनन निर्माण की संज्ञा दी है।
नामवर
सिंह के साक्षात्कार को हम ‘ज्ञान का संचित कोश’ कह
सकते हैं। साहित्य के जटिल प्रश्न, राजनीति की उलझने, संस्कृति
के सुलगते सवाल, माक्र्सवाद की अवधारणा, प्रगतिशील
साहित्य की सीमाएँ और संभावनाएँ, हिन्दी और उर्दू के आंतरिक संबंध,
संस्कृत
साहित्य और काव्यशास्त्र के आतंरिक द्वंद्व, लोक साहित्य का
मूल्य और महत्व, पूँजीवाद, सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद, रूप और वस्तु का मात्रात्मक औचित्य, फासीवाद,
पेरिस्तोरिका
और ग्लासनोस्त का प्रभाव, विचारधारा, दलित विमर्श,
स्त्री
विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि सब कुछ इन संवादों में अटे पड़े हैं। इस सारी
चिंताओं सरोकारों से दो-दो हाथ करते नामवर सिंह। सभी मुद्दों पर अपना निजी विचार।
भले ही ये निजी विचार, लोगों को विवास्पद लगे। नामवर सिंह की किस्मत
में विवाद एक ‘अनिवार्य प्रश्न’ की तरह है। तभी
तो उन्हें कहना पड़ा, ‘‘जब मैं कुछ लिखता हँू तो विवाद, जब
मैं बोलता हँू तो विवाद और यहाँ तक कि जब
मैं खामोश रहता हँू तब भी विवाद।’’24
संदर्भ
1. बात
बात में बात - नामवर सिंह (साक्षात्कार) संकलन संपादन- समीक्षा ठाकुर, वाीण
प्रकाशन - 2006, पृ॰ 9
2. उपर्युक्त,
पृ॰
41
3. कहना
न होगा - (नामवर सिंह के साक्षात्कार) संकलन - संपादन समीक्षा ठाकुर, वाणी प्रकाशन -
1994,
4. बात
बात में बात, पृ॰ 62
5. उपर्युक्त,
पृ॰
63
6. उपर्युक्त,
पृ॰
216
7. साथ
साथ-नामवर सिंह (साक्षात्कार), राजकमल प्रकाशन -2012 सम्पादन आशीष त्रिपाठी, पृ॰
87
8. उपर्युक्त
9. बात
बात में बात, पृ॰ 334-335
10. कहना
न होगा - पृ॰-148
11. बात-बात
में बात, पृ॰ 10-11
12. उपर्युक्त
- 326-328
13. उपर्युक्त
, पृ॰ 328
14. उपर्युक्त
15. कहना
न होगा , पृ॰-130
16. बात
बात में बात, पृ॰ 65, 66
17. सम्मुख,
पृ॰
36
18. कहना
न होगा, पृ॰ - 49
19. उपर्युक्त
,पृ॰ 15, 16
20. उपर्युक्त,
पृ॰
72
21. सम्मुख,
पृ॰
226
22. उपर्युक्त,
पृ॰
102
23. कहना
न होगा, पृ॰ 65
24. बात
बात में बात, पृ॰-19,20
25. उपर्युक्त
पृ॰ 191
26. उपर्युक्त,
पृ॰
193
27. उपर्युक्त,
पृ॰
194
(नामवर विशेषांक, बहुवचन पत्रिका, जुलाई-सितम्बर 2016 में प्रकाशित)


बहुत दिनों बाद एक ऐसा लेख मिला जो अपने आप में एक आलोचक को समझने का कोश है।
ReplyDeleteविचारोत्तेजक लेख।
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