साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा : बचपन की राख से उठता गीत


 

साहिर लुधियानवी की तरह बदनसीब-बचपन किसी को न मिले! किसी का बचपन गरीबी में बीत सकता है, कोई बचपन से पितृहीन हो सकता है लेकिन अफ़रात दौलत के बावजूद अगर कोई बचपन दूसरे के रहमोकरम पर बीते और पिता के रहते हुए भी पिता के साए से वंचित रहे तो यह स्थिति विचलित करने वाली कही जाएगी।   साहिर लुधियानवी के गीतों में जो इतनी पीड़ा है, छटपटाहट है, अमीरों के प्रति जो प्रतिरोध के  तेवर हैं, स्त्री के प्रति जो संवेदनशीलता है उसका उत्स कहीं न कहीं उनके बचपन में समाया  हुआ है।  साहिर लुधियानवी की जीवनयात्रा 'सरक़श फ़कीरके लेखक डॉ रतन लाल महेंद्रगढ़ी ने उस राख़ को कुरेदा है| उनके जीवनयात्रा को लेखक ने  जिस रगात्मकता, संलिप्तता और श्रमशीलता से सिरजा है उससे उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की एक अलग ही छविछटा निखर कर सामने आयी  है। 

साहिर  नाम लुधियानवी का अपना चयन था। वैसे उसका नाम तो अब्दुल हई था।  अब्दुल हई के पिता चौधरी फ़ज़ल मोहम्मद दुर्गुणों के खान थे। अब्दुल हई की  माँ सरदार बेगम चौधरी की दसवीं पत्नी थी। बहाना तो 'चश्मोचिराग' (पुत्र प्राप्त) का था लेकिन वास्तविकता अय्याशी की थी।  क्योंकि दसवीं पत्नी से पुत्र प्राप्ति के बाद भी उन्होंने दो और शादियां की। वेश्यावृत्तिशराबनोशी, महफ़िलबाज़ी उनकी लत थी।  नामीगिरामी इस जमींदार ने एक अत्यंत साधारण घर की खूबसूरत लड़की   सरदार बेगम से दसवीं शादी की। सरदार बेगम का परिवार गरीब था किंतु इस तरह की अय्याशी का वहां नामोनिशान न थी।  जब उसने अपने अय्याश शौहर को इस बाबत रोकने की कोशिश की तो, "ओए, दो टके की औरत! तेरे और मेरे खानदान को एक ही मीजान में मत तौल।  कहां हमारा पुश्तैनी जागीरदार घराना और कहां तू छोटी - सी झोपड़ी की लौंडिया। तेरे बाप के सारे मकान जितनी जमीन में तो हमारा एक नौकर रहता है। मेरे पास बेपनाह जमीन जायदाद है। औरतों से रंगरेलियां मानना तो जमींदारों की शान होती है।  जितना बड़ा जागीरानाउतना बड़ा उनका जनानखाना और उतनी ही ज्यादा उसकी अय्याशियां। कहते हुए फ़ज़ल ने सरदार बेगम के मुंह पर तमचों की बौछार कर दी। (सरक़श फ़कीरपृष्ठ 20)  इस घटना की पुनरावृत्ति होती रही और इसी बीच उन्होंने अब्दुल हई यानी साहिर को जन्म दिया। सरदार बेगम दृष्टिसंपन्न ही नहीं दृढ़ संकल्प वाली महिला थी। अकूत संपत्ति और अय्याश पति को छोड़कर फल व्यापारी अपने भाई के पास हमेशा के लिए चली गई। वह समझ गई कि इस माहौल में अब्दुल हई का भविष्य नष्ट हो जाएगा। उन्होंने कुछ भाई  के सहारेकुछ अपनी मेहनत और कुछ गहने बेचकर अब्दुल हई को पालने - पढ़ाने का करोबार शुरु किया।  विडंबना इसी को कहते हैं "एक तरफ मां है जो अपने जेवरों को बेचकर उसका भविष्य बना रही है दूसरी तरफ बाप फ़ज़ल मोहम्मद है जो अब्दुल के मुस्तकबिल को बिगाड़ने पर आमादा है।"(वही,  पृष्ठ 30) 

अब्दुल हई से लेकर शाहिर लुधियानवी बनने तक और लुधियाना शहर के एक संकोची, डरपोक किशोर शायर से देश के चोटी के शायर बनने तक की लोमहर्षक यात्रा पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जीवनीकार रतनलाल ने अत्यंत संयोजित तरीके से साहिर की औपचारिक शिक्षा के साथ शायरी के प्रति उनके बढ़ते लगाव को रेखांकित किया है । यह लगाव कैसे धीरे-धीरे एक बड़े कवि को जन्म दे रहा थाइसे सृजनात्मक तरीके से लेखक ने नोट किया है।  

'ताजमहल' नज़्म ने साहिर  को राष्ट्रीय स्तर का कवि बना दिया।  वे जहां जाते श्रोता इस नज़्म को सुनने के लिए बेताब हो जाते।  इस नज़्म से उन्होंने पहली बार ताजमहल के स्वीकृत मानी को ही बदल दिया।  ताजमहल से साहिर की शोहरत का आगाज़ हुआ।... ताजमहल नज़्म इतनी मकबूल हुई कि साहिर को हर मुशायरा में बुलाया जाने लगा।  इस दौर में लुधियाना में एक मुशायरा का आयोजन हुआ। इस मुशायरा में साहिर  की शिरकत पर  इब्राहिम जलीस  ने लिखा है,  "जब वह अपनी ताजमहल नज़्म पढ़ता है तो यूं लगता है जैसे दुनिया के सात अजूबों में सबसे ज्यादा खूबसूरत यह ताजमहल  ढह गया हो या लुधियाना के इस बागी नौजवान ने शहंशाह - ए - हिंदुस्तान शाहजहां की मोहब्बत की सबसे कीमती मरमरी यादगार ताजमहल को डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया है। उसी रात हिंदुस्तान की फिजाओं में एक और ताजमहल बुलंद हुआ- साहिर लुधियानवी का ताजमहल।  खुद शाहजहां का ताजमहल दरिया- ए - यमुना के आईने में ही अपना मुंह देखता रह गया और साहिर के ताजमहल की परछाइयां लुधियाना से दर्रा खैबर, डल झील, चाय के बागानों, मालावार की पहाड़ियों और कन्याकुमारी तक फैल गई।" (वही, पृष्ठ 76) लेखक ने साहिर के एक साक्षात्कार के हवाले एक ऐसी  सच्चाई को उद्घाटित किया जिसे सुनकर किसी को भी ताज़्जुब हो सकता है। जिस ताजमहल नज़्म की चर्चा से उर्दू अदब भरा होता उसके बारे में साहिर ने कहा, "आपको यह जानकर हैरत होगी कि मैं आज तक आगरा नहीं गया हूं और जिस लड़की के लिए इस नज़्म में महबूब लफ़्ज़ का इस्तेमाल हुआ है वह लड़की वजूद में नहीं है।" (वही, पृष्ठ 83)

आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस साहिर से गीत लिखवाने के लिए उन दिनों  बड़े-बड़े निर्माताओं और निर्देशकों को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी उस शायर को शुरुआती दिनों में चौखट दर चौखट घूमना पड़ा थानकलनवीसी करनी पड़ी थी। दो जून की रोटी जुटाने के लिए साहिर ने कृष्ण चंदर की रफ़ लिखी कहानियों को सुंदर तहरीर में लिखने का कार्य किया। कृष्ण चंदर के भाई महेंद्रनाथ के अनुसार इस कार्य के लिए प्रति स्क्रिप्ट उसे  45 रुपए मिलते थे। जब वे निर्माता - निर्देशक के पास जाते तो उनका जवाब होता- साहिर साहब! आप उच्च कोटि के शायर हैं हम आपका और आपकी शायरी का बहुत सम्मान करते हैं। हम आपके मुरीद हैं परंतु एक फिल्म की लागत आठ लाख रु होती है और यह जरूरी भी नहीं की एक शायर फिल्म में अच्छा गीतकार भी साबित हो। अच्छे गानों के अभाव में फिल्म पिट भी सकती है। (वही, पृष्ठ 159) जद्दोजहद के इस दौर में साहिर ने कभी नाकामियों से हार नहीं मानी। उसके चेहरे पर मायूसी कभी नजर नहीं आई। घर का चूल्हा जलाने के लिए उसे 'घोस्ट राइटिंग' करनी पड़ी। बकौल महेंद्रनाथ 'साहिर ने कितने ही अपने अनमोल गीत दूसरे गीतकारों को बेचे थे।" (वही, पृष्ठ 163)

साहिर  की जीवन यात्रा के बहाने लेखक ने आजादी के बाद के सांप्रदायिक दंगे की विभीषिका को भी दर्ज किया है। खुद साहिर एक बार इस दंगे की चपेट में आ गए तो अचला सचदेव के घर उन्हें छुपाया गया।  वह अपने एक संस्मरण में लिखती हैं "मुझे याद है एक बार देवेंद्र सत्यार्थी रामप्रकाश अश्क अपने साथ साहिर लुधियानवी को लेकर आए थे और मुझे सहिर को भीड़ से छुपाने को कहा था। यह विभाजन के तुरंत बाद फैले दंगों के दौरान की घटना है।  जो मैं कर सकती थीमैंने किया उसके बाद साहिर साहब जब भी मुझसे मिलते हैं हरदम कहते, भई! मेरी जान तो अचला की अमानत है, यह सांस इसी की दी हुई है।" और इसी देंगे ने उन्हें पाकिस्तान भेज दिया|  वहां भी साहिर साहब की दाल नहीं गली। सरकार के खिलाफ पत्र- पत्रिकाओं में लिखने  और प्रतिरोधी नज़्म के कारण पाकिस्तान सरकार की निगाह इन पर लगी रहती। "वह  अक्सर हमीद अख़्तर से कहता रहता था कि धीरे - धीरे पाकिस्तान में मुल्लाओं और जागीरदारों का गठजोड़ हो जाएगा और अपने हक़  मांगनेवालों पर वे अत्याचार करेंगे।" (वही, पृष्ठ -145)

'दबेगी कब तलक आवाजें - आदम हम भी देखेंगेनज़्म के कारण पाकिस्तान की सीआईडी साहिर के पीछे लगी हुई थी। स्वभाव से डरपोक होने की वजह से वह घर पर ही रहते। तंग आकर वे चुपके से पाकिस्तान से भाग आए।  उस समय लाहौर में हवाई अड्डा नहीं बना था इसलिए सहिर ने वॉल्टन एयरपोर्ट से दिल्ली जाने की तैयारी कर ली। साहिर के लाहौर से चले जाने पर अहमद राही ने लिखा, "भारत की वह दौलत जो मुल्क की तकसीम में पाकिस्तान के हाथ लगी थी, जून 1948 में फिर भारत की तिज़ोरी में चली गई।"  (वही, पृष्ठ 147)

आज सत्ता के सामने साहित्यकार कितने लाचार दिखते हैं। सत्ता से बचने के लिए अधिकांश रचनाकारों ने शाश्वत विषयों पर लिखना शुरु कर दिया है। जीवनीकार रतनलाल ने दिखाया है कि साहिर अपनी रचनाओं में हमेशा सत्ता को प्रश्नांकित करते रहे।  साहिर ने सत्ता से आँखें मिलाकर देश के निज़ाम के सामने दो टूक कहा। अविश्वसनीय-सी घटना लगती है, जब उन्होंने  प्रधानमंत्री के सामने सरकार के पाखंड को अनावृत्त कर दिया था। सन 1969 में बांद्रा में जश्न -ए- ग़ालिब  कार्यक्रम में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ  बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियां मौजूद थीं। देश के बड़े-बड़े शायर मौजूद थे। ऐसे माहौल में शाहिर ने गालिब के बहाने देश में उर्दू की दयनीय स्थिति का पर्दाफाश किया- 

इक्कीस बरस गुज़रे आजादी - ए - कामिल को 

तब जा के कहीं हम को ग़ालिब का ख्याल आया...

 ये जश्न ये हंगामा ख़िदमत है कि साजिश है 

जिन शहरों में गूंजी थी ग़ालिब की नवा बरसों 

उन शहरों में अब उर्दू बेनामो निशा ठहरी...

गालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था 

उर्दू पर सितम ढाकर, ग़ालिब पे करम क्यों है 

ये जश्न , ये हंगामे  दिलचस्प खिलौने हैं 

कुछ लोगों की कोशिश हैकुछ लोग बहल जाएं 

जो वादा एक फ़र्दा पर टल नहीं सकते हैं 

मुमकिन है कि कुछ अर्सा इस जश्न पे टल जाएं...

गांधी हो कि ग़ालिब हो इंसाफ की नजरों में 

हम दोनों के कातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं।

जीवनीकार ने पाठकों का ध्यान इस ओर भी दिलाया है कि साहिर फिल्मी गाने को समाज के ज्वलंत  सरोकार और मुद्दों  से जोड़कर उसे मानीखेज बना दिया करते थे। यह काम अत्यंत दुष्कर था। फिल्म जैसे मनोरंजन माध्यम में यह हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण है। साहिर ने अच्छी फिल्म की परिभाषा में ही जन सरोकारों को लक्षित किया है उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि "वह जो जन सामान्य का मनोरंजन करने के साथ ही उनके दिमाग को भी किसी निश्चित उद्देश्य की ओर ले जाने में कामयाब हो और उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जिससे समाज का भला हो।" ( वही, पृष्ठ 238)   हल्के से हल्के परिस्थितियों और भाव वाले दृश्य में भी वे  अपने गीत को  गंभीर भाव भर देते थे और उसे सामाजिक चिंता से जोड़ देते थे। किसी भी तरह के गीतों में अदबी रंग भर देना उनकी खासियत थी। एक उदाहरण से हम इसे समझ सकते हैं|  खाली डिब्बे को लेकर  एक नितांत हास्य गीत इन्हें लिखने का ऑफर मिला तो उसमें भी इन्होंने सरोकार और अदब का अद्भुत रंग जमा दिया - 

 खाली डब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार 

खाली से मत नफरत करना खाली सब संसार। 

और इस तरह से उन्होंने उस समय हरेक चीज में मिलावट वाले मुद्दे को उक्त गीत में रेखांकित किया। 

लेखक रतनलाल ने साहिर की तुलना मोहम्मद इकबाल से करते हुए लिखा है कि मोहम्मद इकबाल को अपनी पहचान भारतीय होने की बजाए एक मुस्लिम के रूप में ही याद रही।‘ सारे जहां से अच्छा’ गीत में भी वह अपनी इस आइडेंटिटी पर बल देते हैं –

"ए आबरूद - ए - गंगा वो दिन याद है मुझको 

उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा"  अपनी धार्मिक पहचान के बजाय साहिर खुद को इंसान के रूप में देखते हैं। जहां तक देश का सवाल है उन्होंने स्वयं को भारतीय के रूप में प्रस्तुत किया है। गंगा उन्हें अत्यंत प्रिय विषय था- 

‘गंगा तेरा पानी अमृत’  गीत में उन्होंने लिखा 

कितने सूरज उभरे डूबे गंगा तेरे द्वारे 

युगों युगों की कथा सुनाएं तेरे बहते धारे 

तुझको छोड़ के भारत का इतिहास लिखा न जाए 

इस धरती का सुख दुख तूने अपने बीच समोया।

फिल्म वाले अपने उसूल पर गीतकारों से गीत लिखवाते हैं लेकिन सहिर ने फिल्म निर्माता और निर्देशकों के लिए अपने उसूल पर गीत लिखे।  वैसे उसूल वाले कई साहित्यकार  फिल्म में गए लेकिन वे वहाँ  टिक नहीं पाए। सुमित्रानंदन पंत, प्रेमचंद, मजाज, जोश मलीहाबादीसागर निजामी और नरेश कुमार आदि  इसी वजह से टिक नहीं पाए। लेकिन साहिर  अपने उसूल के साथ न सिर्फ़ टिके बल्कि वहां सिरमौर बनकर भी रहे।  इसका कारण वह अपने मार्क्सवादी अध्ययन, समझ और प्रशिक्षण को मानते हैं। जब उनसे एक साक्षात्कार में सवाल पूछा गया कि जहां तक शायरी का ताल्लुक है आप कम्युनिस्ट और नॉन कम्युनिस्ट में क्या फर्क समझते हैंसाहिर साहब का स्पष्ट जवाब था "मैं समझता हूं कि कम्युनिस्ट हुए बिना तरक्कीपसंद अदब नहीं पैदा किया जा सकता।"

साहिर के साथ अपने गहरे लगाव और प्रेम को अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में खुलकर व्यक्त किया है। रसीदी टिकट लिखे जाने की भी एक रोचक कथा है। खुशवंत सिंह को अमृता प्रीतम ने बताया कि लुधियानवी के अलावा उन्होंने किसी से प्यार नहीं किया। यह सुनकर खुशवंत सिंह ने टिप्पणी की "तुम्हारी प्रेम कहानी तो इतनी छोटी है कि ये तो रसीदी टिकट के पीछे भी लिखी जा सकती है।" और यही ‘रसीदी टिकट’ नाम अमृता ने अपनी आत्मकथा के लिए चुन लिया। 1959 में अमृता प्रीतम के नज्मों का संकलन 'कस्तूरी' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इन नज्मों के लिखे जाने की पृष्ठभूमि के बारे में वह बताती हैं कि "एक रोज मैं दिल की आग में तपकर एक नज़्म लिख रही थी। रात भर बेचैन और परेशान रही और फिर सो गई। एक मिसरा से दूसरे मिसरे तक पहुंचने के दौरान हाथ में कलम था। गहरी सोच और ख्यालों में गम थी कि यकायक इस कैफियत में अपनी बाहों और टांगों पर लकीरें खींचती जा रही थी।  जब नज़्म मुकम्मल हुई तो यह बेख्याली टूटी और होश में आई तो देखती हूं कि मेरी बाहों और टांगों पर तकरीबन सौ जगह साहिर, साहिर और सिर्फ साहिर ही लिखा हुआ था।" ( वही पृष्ठ -214) ‘रसीदी टिकट’ अमृता प्रीतम के इजहार-ए-इश्क़ का रोचक दास्तान है| बकौल दास्तान, “लाहौर में  जब कभी  साहिर मिलने के लिए आता था ...वह चुपचाप सिर्फ़ सिगरेट पीता रहता था| कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था| ...कभी एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थी पर मेरे सामने संस्कारों की एक दूरी थी जो तय नहीं होती थी| तब भी कल्पना की करामात का सहारा लिया था| उसके जाने के बाद  मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट के टुकड़ों को संभाल कर आलमारी में रख लेती थी और फिर एक -एक टुकड़े को अकेले बैठकर जलाती थी और जब उँगलियों के बीच पकड़ती थी  तो लगता था उसका हाथ छू रही हूँ| सिगरेट पीने की आदत तब ही पहली बार पड़ी थी| हर सिगरेट को सुलगाते हुए लगता था कि वह पास है| सिगरेट के धुएं में जैसे वह  जिन्न की भांति प्रकट हो जाता था|” (वही, पृष्ठ-84)

जीवनीकार रतनलाल ने जीवनी-लेखन में  निर्ममतापूर्वक कलम चलाई है|  साहिर  जैसे को तैसे में विश्वास करते थे। कई निर्माताओं को वे गीत लिखने के लिए बहुत चक्कर लगवाते। क्योंकि शुरुआती दिनों में उन्हें भी बहुत चक्कर काटने पड़े थे। जब भी अवसर मिलता वे उन एक - एक चक्करों का हिसाब लेते। एक बार उन्होंने अपने मित्रों को बताया कि "उस कमरे में हिंदी फिल्मों का बहुत मशहूर निर्माता सो रहा हैजो कल से यहां आया हुआ है। वह मुझे अपनी फिल्म में केवल एक गीत लिखवाना चाहता है। अभी दो हफ्ते इसके चक्कर और कटवाकर गीत लिखने की सोचूंगा|  इसको अपने घर के चक्कर कटवा कर मुझे बड़ी खुशी मिलती है। इसके दफ्तर की सीढ़ियां की संख्या अभी भी याद है मुझे।"

साहिर अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। एक बार साहिर के घर पर अयोजित एक कार्यक्रम में युवा शायर निदा फ़ाज़ली ने उनकी शायरी पर फ़िराक़ और फैज़ के प्रभाव को रेखांकित किया।  उन्होंने  अभी अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि तेज आवाज के साथ बोले गए साहिर ने सबको चौंका दिया,  "नौजवान!  महफिल में आने से पहले कुछ शऊर और तहज़ीब भी सीखिए। लिहाज और तमीज़ भी होती है दुनिया में। मेहमानों की भी अपनी मर्यादा होती है। फिर उन्होंने निदा फ़ाज़ली को मेज से उठा दिया।" (वही, पृष्ठ -277)

मुंबई में जब साहिर आर्थिक तंगी झेल रहे थे तब युवावस्था के दोस्त पेंटर बाबरी को चौथे ही दिन  अपने घर से निकाल दिया था। यह वही पेंटर बाबरी था जो इनका अज़ीज़ दोस्त था और लुधियाना में मुफलिसी के दिनों में साहिर इसी पेंटर बाबरी की दुकान पर घंटों  बैठते और चाय पीते थे। लेकिन जब वह मुंबई में फिल्मों की तलाश में आया तो साहिर के घर रुका था।  बाबरी को काम तलाशते तीन दिन हो चुके थे, लेकिन वह निराशा के साथ घर लौट आता था। चौथे दिन स्टूडियो जाते समय सहिर ने बाबरी से कहा,  "पंछी, तुम अपना बोरिया - बिस्तर संभालो और चलते-फिरते नजर आओ।  शाम को यहां खाना नहीं मिलेगा।" इस घटना पर जीवनीकार कृष्ण अदीब को उद्धृत करते हुए रतन लाल  लिखते हैं "पेंटर बाबरी को जीवन भर यह खुशफहमी रही कि साहिर उसका अत्यंत निकट मित्र है। हालांकि कई बार वह साहिर के हाथों अपमानित भी हुआ था। कई बार वह सहिर को भला बुरा भी कहा था मुंबई से उस स्थिति में लौटना पड़ा था।"

साहिर जानते थे कि निर्माता और संगीत निर्देशक को कैसे काबू में किया जाता है|  इसकी  रणनीति से वे भलीभांति परिचित थे।  इस सिलसिले जीवनीकार ने एक रोचक प्रसंग का जिक्र किया है। एक बार बड़े संगीतकार रोशन साहिर लुधियानवी से गीत लिखवाने आए। लेकिन उन्होंने विनम्रता पूर्वक उन्हें गीत देने से मना कर दिया। बाद में कृष्ण अदीब को  उन्होंने बताया कि "जब बर्मन दा  को इस बात की भनक लगेगी कि मैं उनके लिए रोशन की पेशकश को ठुकरा दिया है तो वह भी मेरे अलावा किसी दूसरे से गीत नहीं लिखवाएंगे।  बाजार की दुनिया में इसे बिजनेस की स्ट्रैटेजी कहते हैं, नौजवान।“

इसके विपरीत साहिर साहब की सदाशयता भी विलक्षण थी। प्राकृतिक आपदाओं में वे मंहगे टिकट पर बड़े-बड़े मुशायरा आयोजित करते और उन पैसों को राहत कार्यों में लगा देते।  किताब में इस बात की तस्दीक की गई है कि बाढ़ पीड़ितों की इमदाद के दौरान साहिर  ने बिहार और यूपी में मुशायरों के आयोजन के सिलसिले में अपनी गाड़ी से कोई 2000 किलोमीटर की यात्रा की। साहिर साहब की सदाशयता अत्यंत मानवीय थी। जीवनीकार ने इस संदर्भ में एक अद्भुत रोचक प्रसंग का जिक्र किया है। अपने जमाने के सुपरस्टार मास्टर निसार को अपमानित होते देखकर साहिर ने बीआर चोपड़ा जैसे निर्देशक को आड़े हाथों ले लिया था। मामला यह था कि वृद्ध होने के बाद मास्टर निसार के दिन लद गए थे।  दुबले- पतले मास्टर निसार को  किसी फिल्म की शूटिंग के लिए  बुलाया गया था, वे बाहर खड़े थे  और अंदर चर्चा यह चल रही थी कि यह व्यक्ति कव्वाली में ठीक से लिप्सिंग कर पाएगा या नहीं। इस बात पर साहिर ने कहा,  "जानते हो वो आदमी कौन है? जिसे आप मरियल - सा कहकर उसका मजाक उड़ा रहे हो वह कोई भिखारी नहीं है। वह अपने जमाने का सुपरस्टार मास्टर निसार है। राज कपूर - नरगिस और देवानंद - सुरैया की जोड़ियां भी वह जादू नहीं जगा सके जो कमाल मास्टर निसार और मिस कज्जन की जोड़ी ने दिखाया था। कभी इस व्यक्ति के पास दुनिया की सबसे महंगी गाड़ी रोल्स-रॉयस हुआ करती थी। यह वही मास्टर निसार है जिसकी एक झलक पाने के लिए इसी कार्य स्टूडियो में लंच ब्रेक के वक्त लोगों की लाइन लग जाती थी।  आज इस मास्टर निसार की सलाहियत पर बहस हो रही है कि वह किसी और की गई कव्वाली में लिप मूवमेंट कर पाएगा या नहीं।"  इस घटना पर प्रकाश पंडित ने लिखा कि "मैं सहिर को होशोहवास की स्थिति में कभी गंदी गालियां बकते नहीं देखा था, लेकिन उस दिन उसने चोपड़ा ब्रदर्स  और उसके सहायकों की शान में ऐसे लच्छेदार वाक्य बोले की तबियत हरी हो गई।"

साहिर फिरकापरस्ती के सख्त खिलाफ़ थे| उन्हें  उम्मीद थी कि धीरे-धीरे  फिरकापरस्ती समाप्त हो जायेगी| लेकिन उनका यह सपना पूरा न हो सका| उन्हें उम्मीद थी कि “ज्यों-ज्यों इस महाद्वीप में वर्ग-संघर्ष तेज होगा साम्प्रदायिकता का जुनून कम होगा और विश्वव्यापी भाईचारे की परिकल्पना परवान चढ़ेगी, प्रतिगामी संस्थाएँ कमजोर पड़ेंगी और जनतंत्र और समाजवाद की तकतों को बढ़ावा मिलेगा| जब तक हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में मौजूदा शासक वर्ग की जगह वामपंथ ताकतों को सत्ता क़ायम नहीं हो जाती, खुशहाल ज़िन्दगी और संतुलित समाज की प्राप्ति और अल्पसंख्यकों को फिर से बसाने के ख्व़ाब पूरे नहीं हो सकते| हमारे अदीबों और फ़नकारों को इस दौर में पहले से भी ज़्यादा कठिनाइयों का मुक़ाबला करना पड़ेगा|”

रतन लाल महेंद्रगढ़ी कथाकार हैं, स्वभावतः साहिर लुधियानवी की जीवनी में कथात्मक प्रवाह ही नहीं बल्कि रोचकता भी है| उन्होंने उनके जीवन को उनके नज़्मों, विचारों  और फ़िल्मी केरियर के साथ संपृक्त कर दिया है| इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ‘सरक़श फ़कीर’ हिंदी जीवनी परंपरा में एक सार्थक और सर्जनात्मक हस्तक्षेप है|      

 


Comments

  1. साहिर को जानना वाकई बहुत दिलचस्प था। लेखन की रोचकता इसे और दिलचस्प बनाती है।

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  2. कीर्तिनाथ झाDecember 13, 2025 at 12:41 AM

    इस कवि को कौन फिल्म प्रेमी नहीं जानता! किन्तु, आपके रोचक ब्लॉग से इनके व्यक्तित्व की जीवनी की झाँकी भी मिली, और इनकी जीवनी पढ़ने की इच्छा भी जागी।
    साधुवाद।

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