विमर्शक बारह मास : महत्वपूर्ण अंतरविषयी पुस्तक
मैथिली मे वैचारिक पोथीक भारी अकाल रहल अछि। एहि अकालक कारण कें ताकब कठिन स' बेसी असुविधाजनक । मैथिली मे आलोचना, समीक्षाक दरिद्र्य एही वैचारिकताक अभाव मे निहित अछि। एहि दृष्टियें साहित्यकार विभूति आनंद आ इतिहासकार अयोध्यानाथ झाक संयुक्त संपादन मे प्रकाशित पोथी 'विमर्शक बारह मास' अत्यंत उत्साहजनक अछि। मैथिली मे कदाचित एहन पुस्तक नहि छल। संप्रति अंतरविषयी अध्ययन कें बहुत महत्व देल जाइछ। 'विमर्शक बारह मास' सुच्चा आ विलक्षण गुणवत्तापूर्ण अंतरविषयी पुस्तक अछि। एकर संपादक द्वय स्वयं अंतर्विषयी छथि। एहि पुस्तक मे बारह विषय मे देल गेल विस्तृत एकल व्याख्यान कें लिप्यंतरित कए पुस्तक तैयार कयल गेल अछि। ई व्याख्यान व्यवस्थित, सुनियोजित आ सुचिंतित तरीका सँ अपन-अपन क्षेत्रक विशेषज्ञ सँ कराओल गेल छल। बारहो विषयक शीर्षके पढ़ि पुस्तकक सार्थकता आ अर्थवत्ताक अनुमान लगाओल जा सकैछ। तिरहुतिया मंदिर, पनिया अकाल, मिथिला मे कबीरक धमक, कबिर काने क, किरिसि करिए मन लाए, देसिल बयना सब जन मिट्ठा, असूर्यमप्श्या, मिथिला मे कल - कारखाना, मिथिला मे भूमि - संघर्ष, मिथिला मे नाट्य परंपरा, धनि दरभंगा दोहरी अंगा, मिथिलाक वृक्ष - वनस्पति। ई कहबा मे संकोच नहि जे विद्यार्थी, शोधार्थी आ अकादमी मे रुचि रखनिहार लेल ई दुर्लभ पुस्तक अछि।
सुशांत
कुमार सम्पन्न इतिहास बोधक संग तिरहुतिया मंदिर आलेख लिखलनिए। मिथिलाक मंदिर सभ पर बहुत आलेख पढ़ने होयब। ई
आलेख पढ़लाक बाद ओहि आलेख सभहक सीमा स्पष्ट भ' जायत। एहि आलेख मे मंदिरक स्थापत्य आ कारीगरी कें इतिहासक
सत्ता विमर्श सँ जोड़ि कए देखबाक प्रयास कयल गेल अछि।
मंदिर निर्माणक पृष्ठभूमि मे शासन आ सत्ताक वरीयता, हुनक आकांक्षा, एहि मादे राजनीतिक दृष्टि आ भौगोलिक- सांस्कृतिक परिवेश के
इतिहास चेतना संग उद्घाटित कयल गेल अछि। धार्मिक भावना के कात क’ मंदिरक शैलीगत
वैशिष्ट्य कें रेखांकित करब लेखकक उद्देश्य। सत्ताक आवाजाही सांस्कृतिक घुलावटक कारण बनल जे मंदिरक
शैलीगत वैशिष्ट्यक के प्रभावित कयलक आ संगहि ओहि मे विलक्षणता, विविधता आ भिन्नता सेहो अनलक। आलेख एकटा आओर कारण सँ ध्यान खींचैत
अछि। ओ थिक तिरहुत मंदिरक ऐतिहासिक अध्ययन। चीनी यात्री स' ल' क' आधुनिक इतिहासकार लोकनिक गंभीर अध्ययन के आलेख मे सुसंगत
ढंग स राखल गेल अछि। एहि दृष्टि सँ सुशांत डी. बी स्पूनर साहेबक अकादमिक कार्य के अत्यंत
सार्थक मानलनिए। इतिहासकार विजयकांत मिश्राक पोथी 'आर्ट एंड आर्किटेक्चर' के सेहो मानीखेज पुस्तकक रूप में लेखक उल्लेख करैत छथि।
सुशांत अपन आलेख मे निष्कर्षस्वरूप लिखैत छथि, "मंदिर स्थापत्य कला शैलीक विभाजन मे 'तिरुहुतिया मंदिर स्थापत्य कला'
क्षेत्रीय कला शैलीक एकटा विशिष्ट उदाहरण अछि, जाहि मे कतेको प्रकारक मंदिर छै।
तिरहुत मंदिर स्थापत्य कला शैली पर वैज्ञानिक अनुसंधान
करबाक विकल्प बचल अछि।"
पनिया अकाल मे
इतिहासकार अवनींद्र कुमार झा मिथिला मे कूप, वापी (बहुत छोट पोखरि), पुष्करिणी (छोट पोखरि), तड़ाग (बहुत पैघर पोखरि), नदी, धार, डबरा आदिक ऐतिहासिक सुधि लेलनिए। पानिक समुचित आ सुनियोजित
प्रबंधन एहि आलेखक लक्ष्य। आलेख मे वैदिक, पौराणिक आ संस्कृत साहित्य मे पनिक महत्व, बांध आदि पर सारगर्भित बात कहल गेल अछि। कोन तरहें
एकमुंहा विकास पानिक दुश्मन भ' गेल आ नदी, नाला, पोखरि ओहि विकासक पेट मे समाइत चल गेल तकर गंभीर पड़ताल
अवनींद्र जी अपन सुविचारित आलेख में कैलनिए। तटबंधक निर्माण, प्रशासनिक अदूरदर्शिताक कारण बाढ़िक प्रकोप, भूस्खलन, मिथिला
मे ढाल वला क्षेत्रक अभाव आदि सभ पर वैज्ञानिक दृष्टि सँ बात कयल गेल अछि। हिनक ई
आलेख पढ़ैत हमरा अनुपम मिश्रक पोथी 'आज भी खरे हैं तालाब' लगातार
स्मरण मे आबि रहल छल जाहि मे ओ मिथिलाक पोखरिक सुधि सेहो लेलनि अछि। एहि पुस्तक मे
ओ लिखैत छथि "हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे।
इसके पीछे एक इकाई थी बनवानेवालों की तो दहाई थी बनानेवालों
की।
यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ो बनती थी। पिछले 200 वर्षों में नए किस्म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस
इकाई,
दहाई, सैकड़ा को शून्य ही बना दिया।" इतिहासकार अवनींद्र जीक
चिंता मिथिलेक नहि अपितु आजुक वैश्विक चिंता अछि जाहि पर हमरा सभकें गंभीरता सँ विचार करक चाही आ हुनक ऐही बात कें अकानक चाही,
" सौंदर्यीकरणक नाम पर
लगातार पोखरिक चारुकात सँ पक्कीकरण, नदी तटक पक्कीकरण अंधाधुंध भ' रहल अछि एहि सँ पोखरि - नदीक जलीय पारिस्थितिकी नष्ट भ'
रहल अछि और चारुकात सँ बन्हायल
पोखरिक पानि सुखा रहल अछि, सड़ि रहल अछि।"
मिथिला में कबीरक धमक तारानंद वियोगी जीक श्रमसाध्य शोध अध्ययन अछि। वियोगी जी गंभीर शोध अध्येताक रूप में कबीरक मिथिला कनेक्शन कें तकबे नहि कैलनि- ए अपितु सुभद्र बाबूक कबीर संबंधी दुर्लभ शोधक माध्यम सँ प्रमाणित सेहो कैलनि अछि। हिनक शोध निष्कर्ष ई जे कबीर भले बनारस में बसला मुदा जन्म स' लकधक तीस बरिस धरि मिथिले मे छलाह। आशय ई जे कबीर मिथिलाक छलाह । कबीर पथक चारि टा संप्रदाय छल - कबीरचौरा, छत्तीसगढ़ी, जगूदासी और धनौती। ई कम आश्चर्यचक बात नहि जे चारू संप्रदायय अपन - अपन शाखा मिथिला मे खोलने छल, से एकदूटा नहि सैकड़ो मे। दोसर तथ्य ई जे कबीर साक्त स' अत्यंत घृणा करैत छलाह। सूगर के शाक्त सँ नीक बुझइत छलाह-
कैसी बसे जुलाह एक। हरि भक्तों की गुप्त टेक।
बहुत दिना साकत मैं गईया। अब हरि का गुण ले निरबहिया
कबीर काशी जा क' वैष्णव भ' गेलाह।
विचार,
धर्म या पार्टी जे कियो बदलैत अछि ओ पुरनाक सभ सँ बेसी
आलोचना करैत अछि। सैह आलोचना थिक - कबीरक शाक्त आलोचना। सुभद्र बाबू
कबीरक किछु एहन पद सभ सेहो तकलनिए जाहि स’ कबीरक मिथिला कनेक्शन स्पष्ट
भ जाइछ। हुनक अंतिम समयक एकटा पद भेटैत छैक जे किछु एहि तरहें छैक -
ज्यों मैथिल को सच्चो वास/ त्योंहि मरण होय मगह पास।
सुभद्र बाबू आ वियोगी जीक ई स्थापना अनर्गल प्रलाप लागि
सकैत अछि,
मुदा जाहि समय मे विद्यापति बंगालक बुझल जाइत छलाह, ओहि समय मे जखन मैथिल विद्वान विद्यापति कें मैथिल सिद्ध
करबाक प्रयास करैत छलाह त’ गैरमैथिल हुनक सभक खूब मजाक बनाबैथ। सैह स्थिति अखन
कबीर ल'क' अछि।
मिथिला
एहन कर्मकांडी स्थल पर कबीर एहन क्रांतिचेताक की दुर्गति भेल हैत तकर अनुमान लगायल जा सकैछ। परमहंस
लक्ष्मीनाथ गोसाई जी के जखन कबीरक प्रति घोर घृणाभाव छलनि, आम लोकक कथे की। ओ लिखैत छथि-
रहे एक कोई पापी घाती, मरल मघह मे जाई
खात
न ताहि गिद्ध कौवा खग कुकुर देख पड़ाई।
एहने
विकट परिस्थिति मे कबीर मिथिला छोड़ि काशी चल गेल हेताह। वियोगी जी अपन आलेखक अंत
मे लिखैत छथि –“हम आग्रह करब जं
अवसर भेटत त' कबीरक देशना के सुनबा सँ नहि चुकब। दुर्लभ छाथिन ओ। हमारा सभक बड़भाग से मैथिली मे
सेहो छथिन।"
कथाकार
अशोक जीक आलेख कबिर काने क... मिथिलाक
शिक्षा व्यवस्थाक बहुत गंभीर पड़ताल करैत अछि। एहि आलेख मे मिथिलाक पारंपरिक
शिक्षा व्यवस्था मे टोल आ चौपाड़िक योगदान, मैथिलीक बाल साहित्य, बारह खड़ी अर्थात वर्णमालाक उत्पत्ति, अखन धरिक शिक्षानीति, नबका शिक्षानीति, मेकालेक शिक्षा नीति स’ ल’ क’ गांधीजीक बुनियादी शिक्षा आदि
पर सारगर्भित विचार कैलनिए। भारतीय आ मिथिलाक शिक्षा व्यवस्था पर जिनका रुचि छनि
हुनका लेल ई आलेख अत्यंत महत्वपूर्ण अछि। किरिसी करिए मन लाए कमलानंद झाक
आलेख अछि जाहि मे ओ विद्यापतिक पदावली मे कृषिकर्म आ किसान जीवन तकबाक सार्थक
प्रयास भेल अछि।
देसिल बयना सब जन मिट्ठा आलेख
वरेण्य साहित्यकार भीमनाथ जीक अछि। एहि दृष्टिसंपन्न आलेख मे मैथिली आंदोलनक
गौरवशाली
इतिहास कें पाछू मुड़ि कए देखल गेल अछि। एहि आलेखक ऐतिहासिक
महत्व ई जे 1978 केर 'मिथिला मिहिर' पत्रिका में आंदोलनक मादे संपादकीय ' आ आलेख सभ भीमबाबू डायरी रूप में दर्ज कैलनि अछि।
तकरा बाद विभिन्न चरण मे जे आंदोलन भेल तकर
सार्थकता आ आंदोलनकर्मी लोकनिक भूमिका के पहिचान कएल गेल अछि।
नब
चेतनाक युवा लेखिका विभा कुमारी मिथिला मे स्त्रीक दशा और दुर्दशाक सुधि अपन आलेख
असूर्यमप्श्या मे
लेलनिए। हिनका अनुसारें प्राचीन कालीन मिथिला मे स्त्रीक आदर्शपूर्ण स्थिति छल।
लेखिका ओहि पितृसत्ताक मकड़जालक मानसिकता कें तकबाक प्रयास केलनिए जे ओहि
आदर्श स्थिति कें कोन तरहें पलटि देलक। ई आलेख बहुत तरहक भ्रान्त धारणा कें खंडित
करैत अछि। आलेख आजुक भूमंडलीकरणक युग मे स्त्रीक चुनौती आ संभावना पर सेहो गंभीरता
पूर्वक विचार करैत अछि।
मिथिलाक
दुखाइत नस पर कलम चालौलनिए अजित आजाद। मिथिला मे कल - कारखाना जे अछिए नै। आजाद जीक दुःख के बुझल जा सकैत अछि। इतिहासक शरण मे जायब हिनक
विवशता। आलेख कतेको नब जानकारी दैत अछि। जेना कि मुंगेर मे बंदूक आ सिगरेट
फैक्ट्री छल जे बंद भ गेल। लेखक इहो बतबैत चलैत छथि कि कोन कोन फैक्ट्रीक खुलवाक
नियारसियार भेल मुदा ओ नियारेभास भ क रहि गेल। आजाद जी कहैत छथि जे " मिथिला
मे कहियो उद्योगक संजाल छल। चीनी मिल, पेपर मिल, जूट मिल,
दवाई कंपनी, इफ्को खाद कंपनी आदि... 21म सदीक पहिल दशक अवैत-अवैत उद्योग मिथिला क्षेत्र सँ
एक तरह सँ सफाया भ'
गेल। जं मुजफ्फरपुरक कांटी
थर्मल,
बरौनी रिफाइनरी, उर्वरक आ थर्मल प्रोजेक्ट
के छोड़ि दी त'
मिथिला मे कोनो पैघ उद्योग नहि अछि।"
आलेखक आकर्षण अछि अशोक पेपर मिल आ चीनी मिल बंद होयबाक रोचक
खिस्सा। यद्यपि ई बात
रोचक त' नहि भए सकैछ मुदा कानिये क की हैत! एहि
'खिस्सा
स'
सबक त लेले जा सकैछ। आलेखक अंत मे अजित
जी आगुक लेल किछु रस्ता सेहो बतबैत छथि, मुदा ओहि पर हमरा लोकनि कानबात दी तखन ने!
मिथिलाक भूमि संघर्ष एहन
तन्नुक मुदा आवश्यक विषय पर शोधपरक आलेख अछि कमलमोहन चुन्नूजीक। ओ बहुत सावधानी आ
गहराई सँ एहि संघर्षक दस्तावेजी अध्ययन प्रस्तुत कयलनिए। गंभीर
अध्येताक रूप मे हिनक प्रतिष्ठा अछि, ई आलेख ओकर साक्षात परिचायक। एहि संघर्षक महत्व रेखांकित
करैत चुन्नू जी लिखैत छथि "किसान लोकनिक भूमि- संघर्ष ओकर एक प्रकारक जीवन संघर्ष अछि, ओकर अस्मिता - संघर्ष अछि। ई संघर्ष ओकर आर - पारक संघर्ष सेहो होइत अछि। हमार
वक्तव्य आलेखक केंद्र में यैह किसान अछि।" ब्रिटिश कालीन भारत मे किसानक भूमि
संघर्ष स’ ल'क'
मिथिला मे 1972क सेलीबेली कांड धरिक विवेचन विश्लेषण आलेख मे भेल अछि।
स्वामी सहजानंदक अतिरिक्त स्वामी विद्यानंद आ कम्युनिस्ट नेता कामरेड भोगेंद्र झाक भूमिका कें
बहुत विस्तार स' रेखांकित
कयल गेल अछि। लेखक ई कहबा मे सफल भेलाह
अछि जे मिथिलाक भूमि संघर्ष मिथिलाक जमींदारक
जुल्मकथा अछि, प्रतिवाद मे मिथिलाक किसान सेहो संघर्ष रूप मे पटकथा
लिखलनि।
आलेख में कोन संघर्ष मे कतेक किसान शहीद भेलाह तकर विश्लेषण
त'
अछिये हुनक सभक नाम सेहो अछि। कयक कारण स आलेख अत्यंत
महत्वपूर्ण।
कथाकार
- रंगकर्मी प्रदीप बिहारी मिथिलाक नाट्य परंपराक अन्वेषण अपन आलेख मे
अत्यंत रगात्मकताक संग कैलनि अछि। प्रदीप जी विगत लगभग पांच दशक सँ मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल
रहल छथि।
आलेख में प्रदीप जी मिथिलाक नाट्य परंपराक संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत करैत वर्तमान धरिक
यात्रा करैत छथि। मूल रूप सँ मिथिलांचलक
नाट्य परंपरा (रंगमंच) कें बिहारी जी 'उत्सवपरक रंगमंच'क संज्ञा दैत छथि। एहि प्रसंग मे प्रदीप जी नाट्य-लेखन,
अभिनय आ निर्देशक मादे बहुत रास ध्यान देबाक योग्य बात सभ
कहलनिए। मिथिलाक कोन शहर रंगमंचक दृष्टि स' कतेक सार्थक आ सर्जनात्मक रहल अछि तकरो जायजा ओ आलेख मे लैत
छथि। हुनक दुःख ई जे "हम सभ पणिक्कर, रतन थियम, ब. व. कारंत, हबीब तनवीर सनक व्यक्तित्वक रंगकर्मी किएक ने तैयार क' सकलहुं।" जाधरि मैथिली रंगमंच अपना पैर पर ठाढ नहि हैत, स्वावलम्बी नहि बनत, व्यायसायिक (प्रोफेशनल) नहि हैत ता धरि ओ उत्सवी रंगमंच बनल
रहत।
धनि दरभंगा दोहरी अंगा में अमल कुमार झा मिथिलाक विकास में दरभंगा राजक योगदान कें
रेखांकित कैलनि अछि। राज दरभंगाक जन कल्याणकारी योजना सभक विस्तृत विवरण देब लेखकक
मुख्य उद्देश्य। जन कल्याणकारी योजनाक सूची मे भव्य पैलेस निर्माण,
मंदिर निर्माण, राजकुमार लोकनिक उपनयनक भव्य आ विराट आयोजन कें सेहो शामिल
कैल गेल अछि। राज
कौन-कौन विश्वविद्यालय के उदारता पूर्वक सहायता कैलक से बतबैत आलेख
प्रकाशन स' ल ' क '
राज द्वारा आरंभ कैल गेल
उद्योग सबहक जनतब सेहो दैत अछि। राजक विद्या प्रेमक संग उत्सव प्रेम के
लक्षित करैत आलेख
दरभंगा राज संबंधी कतेको अज्ञात तथ्यक उद्घाटनक कारण सँ महत्वपूर्ण बनि गेल अछि। विमर्शक 12 बारहम
आलेख मिथिलाक वृक्ष – वनस्पति में
गणपति नाथ झा मिथिला मे उपलब्ध वृक्ष - वानस्पतिक नाम सहित ओकर सविस्तार उपयोगिता
बतौलनि अछि। एहि मे जतेक वनस्पतिक
रेखांकन भेल अछि ओहि मे कतेको के नमो हमारा लोकनि के अज्ञात
अछि।
विमर्शक बारह मास पुस्तक भारतीय ज्ञान परंपरा में सार्थक हस्तक्षेप करैत अछि।
एकरेखीय ज्ञान परंपराक बरक्स ई पोथी विभिन्न ज्ञान परंपराक
बात करैत अछि। परंपराक बहुवचनात्मकता आ अंतरअनुशासनिकताक कारण ई पुस्तक पठनीयटा
नहि अपितु संग्रहणीय सेहो बनि गेल अछि। एहि पुस्तक कें मैथिलीक एकटा महत्वपूर्ण आ
जरुरी संदर्भ ग्रंथ कहबा मे
संकोच नहि।

सम्पूर्ण पोथीक महत्वपूर्ण बिन्दु सभकेॅं उद्धृत करैत ई आलेख पोथी पढ़बाक उत्सुकता बढ़बैत अछि।
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