रेडलाइट: वर्जित क्षेत्रक कथायात्रा
दीपिका झाक कथा-संग्रह 'रेडलाइट' मैथिली कथासाहित्य मे एकटा एहन वर्जित क्षेत्र मे प्रवेश करबाक साहस करैत अछि, जाहि विषय पर सामान्यतया मैथिल समाज बातो कर' नहि चाहैत अछि। वर्जित क्षेत्रसँ आशय ई जे ओ एहन विषय सभ पर कथा लिखैत छथि जे समाज मे ' टैबू ' मानल जाइत अछि। एहि 'निषिद्ध' परिक्षेत्र मे दीपिका निधोक प्रवेश करैत छथि। स्त्रीक मासिक धर्मक प्रसंग हो वा प्रेमहीन दाम्पत्य-रतिक प्रश्न, सेक्स वर्करक दुःखद गलीज जीवन हो वा लिव-इन रिलेशनशिप, बिनु बियाहे मातृत्व प्राप्त करबाक आकांक्षा हो अथवा परिवारक भीतर होइत यौन शोषण (Intrafamilial Sexual Abuse)—एहि सभ विषयकेँ ओ अपन कथाक केन्द्र बनबैत छथि।
स्त्री-विमर्शक आधा-छिधा समझ केर आधार पर एहि कथा सभ केँ खारिज कऽ देब अथवा अनावश्यक कहि देब जतेक सरल, ओतबे कठिन एहि कथासभक प्रश्नसभ सँ मुठभेड़ करब, ओकर अनिवार्यता बुझब आ ओकर मर्म धरि पहुँचब। कारण ई जे संकलित कथा सभ एहन सार्वभौमिक विषय पर चर्चा नहि करैत अछि जाहिसँ कोनो व्यक्तिगत असुविधा हो। गरीबी, लाचारी, विवाह दान, भ्रष्टाचार जेहन अपेक्षाकृत सुरक्षित विषय सभक बदला ई कथा अपन घरक बात करैत अछि—हमर-अहांक घरक बात, घर मे पसरल अन्हारक बात, घरक पुरुख सभक बात आ घरक स्त्री सभक बात। एहि अर्थ मे दीपिकाक कथा आत्मालोचनक कथा बनि जइछ।
‘आइना’ कथा पति केँ आइना देखेबाक कथा अछि। पत्नी गृहिणी हो अथवा कामकाजी, सामान्यतः हम सभ ओकरा taken for granted लैत छी। दूनू गोटे बाहर काज करैत होथि, तैयो घरक समस्त काज मात्र नहि अपितु पति-सँ सम्बन्धित काज सेहो पत्नीक दायित्व मानि लेल जाइत अछि।
कथा ' आइना ' मे विवाहक किछुए दिनक बाद एक दिन पति एहि बात पर पत्नी पर तमसा जाइत अछि जे ओ बैगसँ हुनकर कपड़ा निकालि सैंति क' किएक नहि रखलक। स्वाभाविक रूपसँ ई बात पत्नी केँ बड अनसुहांत लगैत छै। कथाक टर्निंग पॉइंट ई अछि जे बेटाक एहि स्वभाव स' माय सेहो आहत होइत अछि। ओ अपन पुतोहु केँ कहैत अछि—“बौआकें अहाँ एखनहि जाक' कहियो जे ओ एहि तरीकासँ आगू कहियो अहाँ संग बात नहि करय।... अहाँ ओकर कनियाँ छिये। इच्छासँ
अथवा प्रेमसँ ओकर सभ काजमे सहयोग करबै, जबरदस्ती नहि। ओकरा कतेक केहन शब्द अहाँकें स्वीकार अछि आ अहाँ सभकें एक दोसरसँ अपेक्षाक सीमा कतेक धरि रखबाक अछि से एखनहि कहियौ। जाउ गप करू।"
पत्नी नीक जकाँ बुझि रहल अछि जे एतय सासु नहि, एकटा स्त्री बाजि रहल अछि, भुक्तभोगी स्त्री। एहि कथाक विशिष्टता ई अछि जे एकरा माध्यमसँ मैथिली कथा मे एकटा 'नब सासु'क अवतरण होइत अछि। अन्यथा सामान्यतः माय केँ अपन बेटामे कोनो दोष नहि देखाइत छैक; सभ कमी पुतोहुए मे देखाइत छैक।
पत्नी जा कऽ ई बात पति केँ कहैत अछि। निश्चित रूपसँ पति केँ ई बात बहुत अखरल हेतैक। गम्भीरता सँ देखल जाए तँ एहि मे दोष केवल पतिक सेहो नहि अछि। सम्भवतः हुनक पालन-पोषण एहने परिवेश मे भेल होयत। वस्तुतः अपन सभक परिवार मे बेटा आ बेटीक लालन-पालन एहि प्रकारसँ होइत अछि जे एहन घटना सभ स्वाभाविक बुझि पड़ैत अछि। बेटा बच्चे सँ देखैत अबैत अछि जे ओकर माय आ छोट बहिन ओकर आ ओकर पिताक कपड़ा खीचैत अछि। बाप टीवी मे आ बेटा मोबाइल मे मस्त। महिनाक तीस दिन पत्नी पति आ बेटाक कपड़ा सुखबैत अछि, मुदा कल्पना करब कठिन जे पति एक दिन पत्नीक कपड़ा सुखेबाक कष्ट करए। बेटा आ बेटी दूनू स्कूल जाइत अछि, मुदा घरक काज बेटीयेक बखरा मे।
भारतीय पुरुष केँ एहि प्रकारक पारिवारिक प्रशिक्षण भेटैत अछि—मादा केँ ‘स्त्री’ आ नर केँ ‘पुरुष’ बनाबए बला प्रशिक्षण। एही अर्थमेँ Simone de Beauvoir कहैत छथि—“स्त्री जन्म नहि लैत अछि, ओकरा बनाओल जाइत अछि।” कथा एहि दिस संकेत करैत अछि जे आब एहि प्रशिक्षण केँ बदलबाक आवश्यकता अछि। घरक लड़का सभकेँ सेहो भनसा घर मे
हाथ बँटेबाक शिक्षा देबाक आवश्यकता अछि।
ओहि दिन घरमे हंगामा मचि गेल जखन घरक दुनू पुतोहु अपन भैसूर सँ विवाह करबाक घोषणा कऽ दैत अछि। हुनक कहब ई जे जखन हिनका छूबामे कोनो परहेज नहि , तँ फेर विवाह सँ परहेज किएक? ई अजगुत प्रसंग अछि दीपिका झाक कथा 'डर'क । ई कथा पारिवारिक यौन हिंसाक बीहड़ मे प्रवेश करैत अछि। एहि कथामे भैंसुरक नजरि एके संग दुनू भाबो पर लागल रहैत छैक। परिवारक लेल ओ भैंसुर महा सिधुआ... पूरा गऊ...सरल आ आदरणीय। मुदा सच्चाइ ई अछि जे जखन घरमे पुतोहु असगर रहैत अछि तँ ओ कोनो ने कोनो लाथे घरमे आबि जाइछ—कखनो खुरपी मंगबाक लाथे, तँ कखनो तराजू मंगबाक लाथे। एक दिन तँ ओ हदे कऽ देलक। छोटकी पुतोहु गिनी जखने नहा कऽ बहरेली, ओ पाछाँ सँ गिनी कें पंजिया लेलक। गिनी जा धरि चिचियाइत, आ ओकर सासु पहुँचैत, ताबत ओ पतनुकान।
ओहि दिन दूनू दियादिनी एहि आदमीक भंडाफोड़ करबाक लेल डांड़ सक्कत कयने छलीह। कारण, ओ जैनेत छलीह जे भांडाफोड़क बाद भारी पारिवारिक तूफान मचत। जखन सभक सामने ई बात कहल जाइछ, तँ केओ मानय लेल तैयार नहि होइत अछि, किएक तँ घरक सभ लोकनिक नजरिमे ओ बहुत आदरणीय आ सज्जन पुरुष जे छथि। दुनू पुतोहुक पति आ सासुक चिंता ई नहि अछि जे पुतोहुसभक संग अन्याय भेल अपितु एहि बातक अछि जे पारिवारिक संबंध बिगड़ि जायत आ घरक इज्जति मटियामेट भ' जायत। दूनू दियादिनी सभक सामने कहलक "हमारा सभक इज्ज़तिक रक्षा करब जे नहि जनलक ताहि कापुरुष संग हम सब नहि रहब।" और प्रस्ताव दैत अछि "हम दूनू दियादनी हुनका बड नीक लगलियनि ने त' ओ समाजक सोझा हमारा सभकें बियाहि क अपना घर ल' जाथु। भाबहुक लग अबैत जखन विचार नहि तखन बियाह करबाक लेल कोन विचार।"
मात्र कल्पना स' गढ़ल गेल हवा - हवाई कथा नहि अई 'डर'। एहि कथाक दूरगामी प्रभाव आ भयावहता (डर) के हमरा सभ तखन बुझि सकैत छी जखन परिवारक भीतर होइबला यौन शोषणक आंकड़ा देखी। विभिन्न अध्ययनक अनुसारें एहि तरहक यौन शोषणक कुल मामलाक 30% स' 50% क बीच होइछ। किछु फोरेंसिक आ नैदानिक अध्ययन मे ई आंकड़ा 75% तक पाउल गेल अछि। निश्चित रूप स' एहि आंकड़ा मे बाल यौन शोषण बेसी रहैछ। मुदा कयक कारण स ' वयस्क स्त्रीक यौन शोषण सेहो होइछ। यौन शोषण मे पारिवारिक सदस्य जेना पिता, भाय, चाचा, मौसा, पीसा वा अन्य बहुत नजदीकक संबंधी द्वारा कायल जाइछ। स्त्रीक बियाहक बाद सासुर पक्षक निकटतम संबंधी द्वारा यौन शोषण कयल जाइत रहल- ये। सुनबा मे कतबो खराब लागै मुदा सत्य त' यैह। पारिवारिक मामला होब' के कारण चुप्पी एहि मामला के खाद - पानि उपलब्ध करबइत अछि। ताहि लेल घर स' ल' क' कथा पिहानी मे एहि पर खुलि कए बात होमक चाही। एहि विषय कें संबोधित मैथिल युवा कवि हर्ष भारद्वाज अपन एकटा हिंदी कविता "मैं, जो बलात्कारियों के बीच बड़ा हुआ" मे लिखैत छथि
मेरी माँ
जब चीखना भूल गई और किचन से बाहर निकली
तब मेरी दादी की देह की छटपटाहट भी खत्म हो चुकी थी
और मेरी बड़ी बहन अपने दुपट्टे को भूल कर
मेरी बुआ की लाश खोज रही थी।
मेरी छोटी बहन को उसके कोई दादा
जांघ पर लिखना सिखा रहे थे ए बी सी डी
और मेरी छोटी बुआ के कलाई पर
खून की कोई ताज़ा परत सूख रही थी। ( पूरा कविता एहि लिंक पर पढ़ल जा सकैछ
https://samkaleenjanmat.in/poems-by-harsh-bhardwaj/)
विवाहमे स्त्री-पुरुषक महत्व आ वर्चश्व मे असंतुलन आ पितृसत्ताक संरचनाक कारण आइकाल्हि बहुतो युवा-युवती विवाह संस्था सँ डेराए लागल छथि। संबंध-विच्छेदक बढ़ैत घटनासँ ओ सभ चिन्तित छथि। जेना -जेना स्त्रीसभ आर्थिक रूप सँ सशक्त आ आत्मनिर्भर बनैत जेतीह, तेना- तेना ई प्रवृत्ति अखन आगू बढ़त। ई स्वाभाविक सेहो अछि, किएक तँ पहिने स्त्रीसभ लग एहि प्रकारक विकल्पे नहि छल। सभ तरहक खराब, प्रतिकूल आ दमघोंटू परिस्थितिक बावजूद स्त्रीकेँ पति आ पतिक घरमे शरणागत भऽ कऽ रहए पड़ैत छलै। मुदा जखन स्त्रीसभ सशक्त बनती, तँ स्वाभाविक रूपेँ ओ सभ एहन परिस्थितिक विरोधमे आवाज सेहो उठौती। पुरुषसभ लेल ई आवाज अखन नया अछि। हजारों वर्ष सँ हुनका सभकेँ ‘नहि’ कहनिहार ई स्वर सुनबाक आदति नहि रहल छल।
अरेंज मैरेज हो अथवा लव मैरेज, दुनूमे संबंध-विच्छेदक घटनामे वृद्धि होएत, किएक तँ पितृसत्ता खाली अरेंज मैरेजमे नहि, लव मैरेजमे सेहो अपन उपस्थिति दर्ज करबैत अछि। एहि कारण लिव-इन रिलेशनशिप आ एकल मातृत्वक प्रवृत्ति निरंतर बढ़ि रहल अछि। निःसन्देह, एहि सभक अपन खतरा आ समस्या सेहो अछि, मुदा आइकाल्हिक बहुतो युवा-युवतीकेँ ई तुलनात्मक रूप सँ बेसी सुविधाजनक बुझाइत अछि।
दीपिकाक कथा ‘खाधि लग ठाढ़’ जतए लिव-इन रिलेशनशिप कें लक्षित करैत अछि, ओतए ‘भविष्यक बटिखारा’ एकल मातृत्वक प्रश्नकेँ उठबैत अछि।
‘खाधि लग ठाढ़’ कथामे साकेत आ सोनी जखन एक दिन आकस्मिक रूप सँ पुणेमे अपन बेटा ऋषिक घर पहुँचैत छथि, तँ हुनका सभकें ई देखि चकबिदोर लागि जाइत छनि जे ऋषि ओतए एकटा लड़कीक संग रहि रहल अछि। ऋषि अपन माता-पिताकेँ ओकर परिचय दैत अछि आ कहैत अछि जे हमसभ किछु मास सँ एके संग रहि रहल छी, आ जँ सभ किछु ठीक-ठाक रहल तँ बियाह सेहो कऽ लेब। एकटा मैथिल दम्पतिक लेल ई कोनो छोट धक्का नहि छल। मुदा ऋषि पूर्णतः सामान्य रहैत अछि। हुनक चेहरा पर ने कोनो घबराहट, ने कोनो विषाद आ ने अपराधबोध।
आइकाल्हिक शिक्षित युवक-युवतीकेँ कोनो पूर्णतः अपरिचित व्यक्तिसँ विवाह स्वीकार्य नहि अछि। दू-चारि भेंट-घाट मे एक-दोसराकेँ ठीकसँ बुझब सम्भव नहि। एक-दोसराक गुण-दोष तँ संग रहलाक बादे बुझल जा सकैत अछि। लिव-इन रिलेशनशिपक प्रति आकर्षणक एक कारण ई सेहो अछि। ई कथा लिव-इन रिलेशनशिपक ने महिमामंडन करैत अछि आ ने ओकर आलोचना। ई कथा हमरा सभकेँ एहन सामाजिक स्थितिसँ परिचित करबैत अछि जे भविष्यमे आरो सामान्य भऽ सकैत अछि। कथा पाठककेँ स्वयं विचार करबाक लेल छोड़ि दैत अछि जे ओ भविष्यक बाट स्वयं निर्धारित करथि।
‘भविष्यक बटिखारा’ कथामे आरवक पूर्व स्कूली मित्र देबोलीना अत्यन्त प्रसन्नताक संग एकल मातृत्वक जीवन जीबि रहल अछि। ओकरा एकटा बेटी छै, मुदा ओ ने विवाह कएने अछि आ ने कोनो पुरुषक संग रहैत अछि। ओ स्पर्म बैंक सँ कोनो स्वस्थ, सुन्दर आ मेधावी पुरुषक शुक्राणु ल' क' एकटा बच्चीक जन्म देने अछि। एहि प्रकारक एकल मातृत्व लिव-इन रिलेशनशिपसँ सेहो आगाँक डेग अछि। मूल प्रश्न फेर वैह - पितृसत्ताक जटिल संरचना। लिव-इन रिलेशनशिप सेहो एहि गहींर पितृसत्तासँ पूर्णतः मुक्त नहि।
देबोलीनाक तर्क अछि जे ओ अखन विवाह नहि कर' चाहैत अछि, मुदा मातृत्वक अनुभव प्राप्त करैत बच्चाकेँ जन्म द' ओकर लालन-पालन अवश्य कर' चाहैत अछि। विवाह तँ बादोमे भ' सकैत अछि, मुदा एक निश्चित आयुक बाद स्वस्थ सन्तानकेँ जन्म देब स्त्री लेल कठिन। देबोलीना सन स्त्री (पीढ़ी) विवाह आ मातृत्वकेँ एक मे मिज्झर नहि करैत अछि दूनूकें अलग-अलग देखइत अछि। सन्तानकेँ जन्म देब' आ ओकर पालन-पोषण करबा मे दायित्व मुख्यतः ओहि बच्चा धरि सीमित रहैत छैक, मुदा बियाह दायित्वक सामूहिक आ विस्तृत रूप होइछ। बियाहक बाद स्त्रीसँ नाना प्रकारक अपेक्षा बढ़ि जाइत अछि। या तँ ओ अपन बहुत किछु दाँव पर लगा क' सभ अपेक्षाकेँ पूरा करए, अथवा ‘खराब बहू’क तमगा ल' क' जीवन बिताबए। जखन आइ हजारों परित्यक्ता स्त्री एकल मातृत्वमे अपन सन्तानक पालन-पोषण कऽ रहल छथि, तँ फेर एहि बातसँ की अन्तर पड़ैत अछि जे बच्चाक पिता के अछि?
ई दुनू कथा भविष्यक आहटि सुनबाक प्रयास करैत अछि आ पाठककेँ मानसिक रूप सँ आगत समयक परिवर्तन लेल तैयार रहबाक सन्देश दैत अछि।
मद्धिम आँच मे उधिआइत' अभिषेक आ आँचलक दाम्पत्य जीवनक कथा अछि। प्रेम आ यौन संबंधक द्वंद्व एहि कथा कें विशिष्ट बनबैत अछि। कथा विचलित करय बला प्रश्न उठबैत अछि जे कि बियाह शारीरिक संबंधक पर्याय मात्र अछि? पति - पत्नीक बीच प्रेम, एक दोसराक प्रति सम्मान आ भावनात्मक साझेदारी जं अनुपस्थित हो तखन दैहिक संबंध स्त्रीक लेल संतोषक नहि अपितु घोर पीड़ाक कारण बनि जाइछ। कथा बहुत धीरे स' प्रेम आ सेक्स्क बीचक मेंही अंतर कें रेखांकित करैत अछि। कथा विवाह संस्थाक ओहि दुःखद पक्ष दिस संकेत करैत अछि जाहि मे पत्नीकें पतिक यौन आवश्यकताक पूर्तिक माध्यम भरि मानि लेल जाइत अछि । ई दृष्टि स्त्रीकें एकटा स्वतंत्र व्यक्तित्वक स्थान पर एकटा वस्तु मे रूपांतरित कए दैत अछि।
ई कथा प्रेमविरत दांपत्यक ओहि भीषण त्रासदीक उद्घाटन करैत अछि जतय स्त्री पतिक संग रहितो भावनात्मक रूप सँ ओकरा संग नहि अछि। कथा मे पत्नी पति स' आत्मीयता चाहैत अछि, संवाद आ स्नेहक लिलसा मे अछि। कथाक अंत मे जखन पति ओकरा जबरदस्ती बिछौन पर ल' जाए चाहैत अछि त' ओ येन केन प्रकारें पतिक बंधन सँ अपना के छोड़ा बाथरूम चल जाइत अछि आ टैप के खोलि ओकर नीचा बैसि जाइत अछि। कथाक ई प्रतीकात्मकता ओकर अंदरुनी पीड़ा आ घुटन कें बाहर करबाक ब्योंत अछि। कथा पितृसत्तात्मक वैवाहिक संबंध मे स्त्रीक वस्तुकरण, भावनात्मक उपेक्षा आ अस्तित्वगत प्रश्नक मार्मिक अभिव्यक्ति बनि जाइत अछि।
मुंबई सन महानगर में बेटाक बियाहक पश्चात वन रूम सेट मे बेटा - पुतोहु संग दूनू प्राणीक रहबाक टा समस्या रहैत त 'प्राइवेसी' कथा एकटा सामान्य कथा बनि कए रहि जाइत। मुदा लेखिका एकरा एकटा भिन्न मोड़ देबाक प्रयास कयलनि - ये। बेटाक बियाह होइते देरी कि माता - पिता अकस्मात बूढ़ भ' जाइछ? की ओहि दूनू प्राणी कें एकांतक बेगरता नहि? बेटाक बियाहक बाद विपिन हॉल मे सुतै छथि आ पत्नी अनु छोटछिन पूजाघर मे। मैथिल परिवारक लेल ई कोनो असामान्य बात नहि। स्वाभाविक रूप स' बेटा कें एहि मे कोनो असहजता महसूस नहि होइत छनि। मुदा पुतोहु कें ई बात बहुत असहज करैत छैक। ओ अपन बर के कहै छथिन जे "हमरा अहाँ कें अपन प्राइवेसी चाही त' मां - पापाकें नहि?" बेटाक प्रश्न ई जे "एहि उम्र मे आबि क' आर केहन प्राइवेसी चाही हुनका सभकें?" "एकांतक खगता सभ कें होइ छै अभिनव। जहिना हमरा - अहाँकें अछि।"
कथाक अनकहल पक्ष ई जे उम्र बढ़ला संग असुरक्षा बोध सेहो बढ़ि जाइछ, एक दोसरा प्रति केयर करबाक प्रवृत्ति सेहो बढ़इछ। एक दोसरक सुख - दुख साझा करब सेहो बेसी भ' जाइछ। मुदा धियापुता लेखे आब एहि उमर मे प्राइवेसीक कोन खगता। ई कथा बहुत संवेदनशीलताक संग एहि ' खगताक' मादे पाठक स' संवाद करैत अछि।
संग्रहक शीर्षक कथा 'रेडलाइट' मुम्बई महानगर केर सेक्सवर्करक कथा अछि। ओहि सेक्सवर्करक कथा जे प्रत्येक सांझ सिंगार पटार क' कोनो रेडलाइट पर रुकल चरिपहिया सभ मे ग्राहक तकैत अछि। ओ कोन तरहें गहकी पटबैत अछि, ओकरा संग केहन व्यवहार कैल जाइत छैक, आ सभस'
बढ़ि कए ओ ई काज करबाक लेल किए विवश होइछ। एहि सभ प्रश्न पर कथा मे बहुत संक्षिप्त बात कैल गेल अछि। सेक्स वर्करक जीवनक अन्हार कें देखबाक बहुत व्यापक प्रयास कथा मे नहि कैल गेल अछि। एकटा विशेष दृश्यावली कें ल' क' कथा बुनल गेल अछि।
कथा ‘चान’ रंगक पूर्वाग्रहक विषय पर लिखल गेल एकटा महत्वपूर्ण कहानी अछि। हम सभ अपन सामाजिक जीवनमे रंगक प्रश्नक प्रतिये प्रायः चेतनशील नहि रहैत छी। कोनो बच्चाकेँ गोरका आ कोनो बच्चाकेँ करिकबा कहि देब हमरा सभक लेल सहज बात होइत अछि, मुदा एहि बातक ओकर मन पर की असर पड़ैत अछि, से हम सभ नहि बुझि पबैत छी। ‘चान’ कथाक नायिका श्यामवर्णक अछि, अर्थात् कारी। ओकर बियाहक तैयारी चलि रहल अछि। ओकर माय आ सासु दुनू गोटे मिलि कऽ साड़ी चुनि बिछि क' कीनि रहल अछि। नायिकाक इच्छा गुलाबी साड़ी पहिरबाक मुदा दुनू गोटे गुलाबी साड़ी एहि कारण नहि किनैत अछि जे ओकर श्यामरंग पर गुलाबी साड़ी नीक नहि लागत। ओ सभ ओकर रंगकेँ प्राथमिकता दैत छथि, ओकर इच्छा आ आकांक्षाकेँ नहि। बच्चेसँ ओ अपन रंगकेँ ल' क' अतिशय हीनताग्रंथि सँ ग्रसित रहल अछि। कथाक अंतमे ओकर पति एहि हीनताग्रंथिकेँ तोड़ि दैत छैक, जखन ओ जन्मदिनक उपहारक रूप ओकरा गुलाबी साड़ी आनि दैत छैक।
देखए मे ई बहुत सामान्य बात बुझाइत अछि, मुदा वास्तवमे ई सामान्य अछि नहि। आजुक समयमे जखन एकटा वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारीकेँ सेहो अपन रंगक कारण ताना सुनय पड़ैत छैक, तखन एहि कथाक निहितार्थकेँ बेसी गहराइ सँ बुझल जा सकैत अछि। किछु वर्ष पूर्व केरल केर शारदा मुरलीधरनक एकटा पोस्ट सोशल मीडिया पर बहुत वायरल भेल छल। एहि पोस्टमे ओ अपन कारी रंगकेँ ल' क' पीड़ा व्यक्त कयने रहथि। शारदा मुरलीधरनक बारे मे रोचक तथ्य ई अछि जे ओ अपन पति वी. वेणु केर बाद केरल सरकार केर मुख्य सचिव बनलीह। ओ अपन पति सँ मुख्य सचिव पदक कार्यभार ग्रहण केने रहथि। ओहि समय देशक इतिहासमे ई पहिल अवसर छल जखन कोनो पति अपन पत्नीकें मुख्य सचिव पदक कार्यभार सौंपने छल।
हुनक पति जाहिना गोर तहिना ई कारी। मुख्य सचिवक रूप मे अपन कार्यकालक अवधि मे कहल जाई जे हिनक कार्यकाल 'ओतबे कारी जते हिनक पतिक सफेद'। रंगभेदक ई टिप्पणी स' ओ व्यथित छलीह आ कहली जे हमरा अपन कारी रंग कें स्वीकार करबाक आवश्यकता अछि। अपन वायरल पोस्ट मे ओ लिखैत छथि, "काला होने में कोई शर्म की बात नहीं। काला सिर्फ एक रंग ही नहीं है, काला एक वर्ग से जुड़ी समस्या है, एक हृदयहीन निरंकुशता है। लेकिन काले रंग को क्यों बदनाम किया जाता है? काला रंग ब्रह्मांड का सर्वव्यापी सत्य है। यह ऐसा रंग है जो हर जगह काम करता है।" अपन बाल्यावस्था के याद करैत ओ पोस्ट मे आगू लिखैत छथि "जब मैं चार साल की थी तब अपनी मां से पूछा था कि क्या वह मुझे फिर से गर्भ में रख सकती हैं और मुझे काले से गोरा और खूबसूरत बना सकती हैं?" एहि प्रसंगसँ स्पष्ट होइत अछि जे रंगक आधार पर भेदभाव आ पूर्वाग्रह आइयो समाजमे अत्यंत जड़ि तक धंसल अछि। कथा ‘चान’ एहि सामाजिक मानसिकताक विरुद्ध एकटा संवेदनशील आ सार्थक हस्तक्षेप करैत अछि।
'गणपति बप्पा मोरया ' कथा मे स्त्रीजन्य मासिक धर्मक प्रति जे रूढ़ि समाज मे परिव्याप्त अछि तकर खंडन होइत अछि। कथा नायिका कें गणपति बइसेबाक छनि मुदा संकट ई जे ओ मूर्तिक स्पर्श धरि नहि क सकैत छथि। जखन दोकान पर मूर्ति बेटा बोते नहि उठल त ओ एहि धर्मसंकट कें त्यागि मूर्ति उठा लैत छथि आ जोर स' हाक दैत छथिन - गणपति बप्पा मोरया। पूर्व मे जतेक ईथउथ रहल होनि मुदा बेर पर निर्णय लेबा मे एक मिसिया समय नहि गमऊली।
रेडलाइटक अधिकांश कथा आजुक बदलैत सामाजिक - सांस्कृतिक परिवेशक गंभीर अवलोकन करैत अछि। कहबाक लेल अधिकांश कथाक पृष्ठभूमि मुंबई महानगर अछि मुदा बहुत जल्दी ई पृष्ठभूमि नगर कस्बा धरिक सहजहि यात्रा करत, ताहि मे संदेह नहि। कथाक विषय आ ओकर ट्रीटमेंट स' सहमति - सहमति अपना जगह पर मुदा ओहि सत्य कें अस्वीकार नहि कैल जा सकैछ जकर निर्द्वंद उद्घाटन कथा सभ मे भेल अछि। लेखिकाक प्रगतिशील दृष्टि बहुत स्पष्ट अछि। एही प्रगतिशील दृष्टि स' आधुनिकताक नाम पर सब किछु के स्वीकार करब लेखिकाकें स्वीकार नहि। संग्रहक अधिकांश कथा पाठकक विचारबोध मे हिलकोर त' अवश्य अनैत अछि। कएटा विषय पर कथा पुनर्विचार करक लेल पाठक कें आमंत्रित करैत अछि। दीपिकाझाक कथासंग्रह ' रेडलाइट ' मैथिली कथा दुनिया कें विस्तार दैत अछि एहि मे दू मत नहि।
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