ऋतुराज की कविता : ज़िन्दगी के अधूरेपन का महात्म्य
ऋतुराज कवि हैं, कवि से पहले एक संवेदनशील मनुष्य हैं और उनकी संवेदनशीलता विकास के द्रुतगामी रथचक्र में पीछे... बहुत पीछे छूट गए वैसे लोगों के प्रति है जिनकी नागरिकता आज खतरे में है| जिन्हें अब सपने आने भी बंद हो गए हैं| अधूरापन जिनकी नियति है| ऋतुराज की कविता ऐसे लोगों को संबोधित है जो बस जिये जा रहे हैं, जिनकी जीने की चाहत बस आज का दिन निपट जाने तक सिमट गया है| ये ऐसे बेघर लोग हैं, जिनसे सरकार घर ही नहीं जमीन की रसीदें भी मांग रही है| ये कवि के ‘अपने लोग’ हैं-
बिल्कुल अकलुषित और बेजान
ये मेरे लोग
धरती बसाते हैं
पर अभी तक भी उजड़े हैं
वक्त का सैलाब इन्हें
घोंसले-सा काटकर निकल गया है
इनकी आँखों में
बेघर होने का खालीपन है
(अपने लोग, पुल पर पानी, 1981, राजकमल
प्रकशन, पृष्ठ 49)
कवि के ऐसे फटेहाल ‘अपने लोग’ आज के ‘शाइनिंग इंडिया’ और ‘न्यू
इंडिया’ में पैबंद के समान हैं। पैबंद का हटना जरूरी है| नगरिकता की बेचैन खोज यूँ
ही नहीं है| कांग्रेस के समय किसी बड़े राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर (2010 के राष्ट्रमंडलीय खेल प्रतियोगिता)
ऐसे कानून पारित किए गए जिन्होंने गरीबों
को कपड़ों पर धब्बों की मानिंद गायब कर दिया था| बावजूद जो मलिन बस्तियां बची रह
गईं उन्हें विनायल की कनातों से ढक कर ओट में ले लिया गया, जिन पर लिखा था- आपकी
दिल्ली खुश-आमदीद| कवि के ये
‘अपने लोग’ तो उस कनात के पीछे थे-दम साधे| ये दम साधे दिशाहार लोग हैं| कवि
ऋतुराज इन्हें अच्छी तरह पहचानते हैं
जानता हूँ इस साफ सुथरी बस्ती में
यह घिनौना चेहरा किसका है?
(पुल पर पानी ,पृष्ठ-34)
कवि के ये ‘अपने लोग’ अचानक एक दिन धड़धड़ाते हुए शहर आते हैं और उसे खूबसूरत
बनाकर फिर अचानक कहीं गुम हो जाते हैं| कवि ऋतुराज जानते हैं कि वे कहाँ से आते हैं और फिर कहाँ गायब हो जाते
हैं? एशियार्ड खेल के लिए महीनों ये लोग स्टेडियम बनाते रहे, उसे सजाते और संवारते
रहे-
आखिर भूखे घुम्मकड़ बिहार राजस्थान और मध्यप्रदेश के
आदिवासियों ने
भव्य स्वर्ग जैसे स्टेडियम बनाकर
उन्हें सौंप दिये
आखिर वे अंधेरे की पृष्ठभूमि में असंख्य टुकड़ियां
अपना काम मुस्तैदी से करके
उनके शहर के चमकीले मलबे में दब गयीं
(एशियाड, नहीं प्रबोधचंद्रोदय, 1984, पृष्ठ-81)
ऋतुराज की कविता हमारे अभिजात्य काव्यबोध को हिलती-डुलती ही नहीं बल्कि झटका भी
देती है। क्योंकि इनकी कविता ऐसे लोगों की कविता है जिनमे कौतूहल या रोमैंस मार्का
कुछ भी खोज पाना बालू से तेल निकालने के माफिक है| इनकी कविता में ऐसे-ऐसे नायक...
नहीं ‘विदूषक’ हैं जिसके लिए किसी भी
सरकार ने मल निष्कासन तंत्र तक की व्यवस्था नहीं की। सारे सरकारी दावों के बावजूद वे आज भी सीवेज पाइपों
पर बैठकर निवृत्त होते हैं| ‘आहत देश’ की लेखिका अरुंधति रॉय के शब्दों में कहें
तो “वे सड़कों पर रहते हैं, सड़कों पर खाते हैं, सड़कों पर सम्भोग करते हैं, सड़कों पर
बच्चा पैदा करते हैं, सड़कों पर बलात्कार का शिकार होते हैं, अपनी सब्जी-तरकारी
काटते हैं, कपड़े धोते हैं, बच्चों को
पालते-पोसते हैं, सड़कों पर ही जीते हैं और सड़कों पर ही मर
जाते हैं|” कविता में रमणीयार्थ की तलाश करने वालों को कवि
के शब्दों में-
उन्हें क्या पता कि झाड़ियों की ओट में नहाना कैसा होता है?
और प्रसव के लिए खुले में तनी चादरों के बीच
कितनी पीड़ा होती है|
दुनिया की प्राचीनम संस्कृति है विस्थापित मनुष्यता|
(उल्काएँ, लीला मुखारवृंद, 2002, पृष्ठ-18)
अब भला आप ही बताएं कि इस तरह के लोगों पर लिखी कविता में
क्या रस, क्या अलंकार, क्या छंद और क्या ‘रमणीयार्थ प्रतिपादकः’|
इससे बड़ी उलटबाँसी और क्या हो सकती है कि जैसे-जैसे समाज
आधुनिक, वैज्ञानिक और तार्किक होता जा रहा है उसी अनुपात में धार्मिकता और धार्मिक
वाह्याडंबर भी स्वीकारता जा रहा है। वैज्ञानिकता और धार्मिकता की गलबहियां का यह
युग कुछ-कुछ मध्यकालीनता का बोध कराए तो आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए| कदाचित
आधुनिक मध्यकालीनता इसी को कहते हैं। ऋतुराज की कविता सभी तरह के धार्मिक व्यामोह
से मुक्त है। कविता ही नहीं विचार मैं भी| काव्य संग्रह लीला मुखारविंद (2002) की
भूमिका में वे लिखते हैं, “संसार के उन सभी नास्तिकों के लिये जो बिना निराश हुए
अपने विवेक की दृढ़ता में साहसपूर्ण संघर्षरत हैं| मानव जाति का सुखमय भविष्य ही जिनका परलोक है|” अपनी
प्रसिद्ध कविता ‘श्री ईश्वरचरितम’ में कवि ईश्वर के सारे छलछद्म को बेनकाब ही नहीं
करते हैं बल्कि ईश्वर के नाम पर चलने वाले धारावाहिक फ़रेब को भी बेहिचक बेपर्द करते हैं-
मैं जानता हूँ, ईश्वर|
तुम कहीं नहीं हो
सिर्फ अन्याय को नाम देने के लिए मैं तुम्हें याद करता हूँ
मैं घृणा कर सकूँ दूसरों से
आतंकित कर सकूँ उन्हें ताकि निर्द्वंद्व जी सकूँ
अत्याचार कर सकूँ तुम्हारे नाम पर
ईश्वर, मैं तुम्हें अपनी ढाल बनाकर लड़ सकूँ
(श्री
ईश्वरचरितम, लीला मुखारवृंद, 2002, पृष्ठ-83)
कहने-सुनने में भले बुरा लगे किन्तु दुनिया भर के धर्म का
व्यावहारिक चेहरा घृणा और हिंसा का है| धर्म के नाम पर जितनी हिंसा दुनिया भर में
हुई है वह अलग से शोध का विषय हो सकता है| वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति|... धर्म के
प्रति वैकल्पिक विचार ऋतुराज को हिंदी काव्य परंपरा से भी मिली है| नागार्जुन तो भगवान को ‘कल्पना का पुत्र’ ही
कहते हैं| ‘कल्पना के पुत्र हे भगवान’ में उन्होंने मूर्ति के आगे नाक रगड़ते लोगों
को देख कर इसे मनुष्य जाति की सबसे बड़ी दासता कहा है| धर्म के आवरण और विशालकाय छतरी में अन्याय और अत्याचार को ढकना बहुत आसान हो
जाता है| जाने-अनजाने समाज में कितने आशा
राम बापू हैं, जो अपनी विराट छवि से ‘चारा’ ढूंढ़ते हैं| कविता ‘श्री ईश्वरचरितम’
इस कटु यथार्थ से हमें रूबरू कराती है-
तुमने सुंदर लड़कियों को देखा
और उनके पिता को आशीर्वाद दिया
तुमने उनके सफेद झड़ते बालों में कंघी की
जिन्होंने अपनी देह का सत्व
तुम्हारी तांबे की गंगाजली में उड़ेल दिया
तुमने कभी नहीं चाहा कि वे किसी और को देखें|
(श्री ईश्वरचरितम, लीला मुखारवृंद, पृष्ठ-84)
प्यारे, मैं हवा में तेरे हाँफते सीने से लगी
देखती हूँ कि किस तरह बचाए लिये जा रहा है मुझे
(साइकिल पर, लीला मुखारवृंद, 91)
प्रेम का यह क्षण दुर्लभ है| प्रेमिका के एक हाथ में रवड़ी
का दोना है और दूसरे हाथ में साइकिल का हैंडल| दोनों जल्दी से जल्दी गंतव्य तक
पहुंचना चाहते हैं
खोटे ,जानती हूँ
दरवाजा खोलने को जब खड़ा होगा तू
कुछ बोलने से पहले ही चाटने लगेगा
रबड़ी से तरबतर मेरा यह हाथ
(साइकिल पर, लीला
मुखारवृंद, 91)
ऋतुराज की कविता में प्रेम का प्रदर्शन वर्जित है, क्योंकि
यहाँ प्रेमी-प्रेमिका दोनों श्रमिक वर्ग से हैं| प्रेम का भी अपना वर्ग चरित्र
होता है| यह कहना अनुचित है कि उच्च वर्ग में प्रेम नहीं होता है| लेकिन इतना तो
कहा ही जा सकता है कि उच्च वर्ग में प्रेम का पाखंडपूर्ण प्रदर्शन भी खूब होता है|
यहाँ गिफ्ट के आकार से भी प्रेम का आकार-प्रकार
निर्धारित होता है। ऋतुराज के यहाँ तो घिसटते हुए चप्पलों में भी संगीत की ध्वनि
छिपी होती है
जनता हूँ तुम्हारी खांसी में एक कहानी घटित होती है
तुम्हारे चप्पलें पहिने कमरे में घिसटने से
दारुण और निर्मम संगीत की लय बनती है|
(तुम्हारे
भीतर से रचने के लिए, पुल पर पानी, पृष्ठ-67)
अभाव और प्रेम की रस्साकशी में अंततः अभाव ही पराजित होता है और प्रेम की
जीत होती है| प्रेमी-प्रेमिका एक-एक पल को जी लेना चाहते हैं
उन्हें खिलते हुए
झांकते हुए कपड़ों में अटकते देखने के लिए
फुरसत का एक झूलता हुआ पल दो|
(बस तुम ही नहीं, पुल पर पानी, पृष्ठ-36)
ऋतुराज की कविता को स्त्री होने से गुरेज नहीं है, लेकिन ‘स्त्री
जैसी’ दिखने से परहेज है| सवाल है कि यह ‘स्त्री जैसी दिखना’ क्या बला है? दुनिया भर के मुख्यधारा का प्राचीन साहित्य स्त्री के मद्देनजर इसी ‘जैसी’
पर टिका हुआ है| ऋतुराज की चिढ़ इसी आरोपित ‘जैसी’ पर है| सीमेंस दी बउवार इसी
‘जैसी’ को कहती हैं ‘स्त्री बनाना’| पितृसत्ता का सबसे बड़ा
प्रोजेक्ट अपने मनोनुकूल ‘स्त्री गढ़ना’ है। मनुस्मृति इसका आदर्शतम रूप है।
रामचरितमानस में अनुसूया द्वारा सीता को
दिया गया उपदेश इसी ‘स्त्री गढ़न’ की
काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। ऋतुराज इस ‘जैसी’ को उलट देते हैं। उनके अनुसार स्त्री
में ‘विष’ भी आवश्यक है| केवल और केवल अमृत के कारण ही उनका सिलसिलेवार शोषण होता
है| ‘लड़की’ कविता में जब से लड़की बिच्छू से प्रेरणा लेकर अपने में डंक को समाहित
कर लेती है ‘खुद को भयमुक्त’ महसूस करने
लगी है-
खन्दी वाला आया
तो लड़की ने उसे वह बिच्छू दिखाया|
तहसील चपरासी किश्त का
नोटिस चस्पा करने लगा
तब भी उसने वैसा ही किया
उसका होने वाला ससुर धमकी देने आया
तब बिच्छू को घसीटकर उसने आगे पटक दिया
(लड़की, अबेकस, 1982, पृष्ठ-26 )
गरलयुक्त सर्पत्व पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों के लिए भी
अनिवार्य है| ‘दंतहीन विषरहित, विनीत और सरल’
स्त्रियाँ होना तो आ बैल मुझे मारना है| तभी तो ऋतुराज की ‘लड़की’-
लड़की काफी हद तक
एक आतंकवादी कार्यप्रणाली का
इस्तेमाल कर रही थी
क्योंकि
बिच्छू का पूरा सहयोग उसे प्राप्त था|
(लड़की,
अबेकस, पृष्ठ-26)
उपनिवेशकालीन हिंदुस्तान में प्राचीन कालीन ‘स्त्री गढ़न’ को एक बार फिर से मजबूती प्रदान करने की कोशिश
की गई। ‘आदर्श गृहिणी’, ‘आदर्श पत्नी’
मार्का किताबों से दुकानें भर गयीं| उसका
प्रभाव आज भी जस का तस बना हुआ है| यही वजह है कि हिंदुस्तान की लड़कियां चाहे तो
एवरेस्ट चढ़ जाए किंतु वह अपना शहर भी अकेले पार नहीं कर सकती| इस तरह की अनिवार्य
आदर्श किताबें स्त्रियों के मनोबल को तोड़ने के लिए ही लिखी जाती हैं| इसी मनोबल को तोड़ने के लिए सात वर्ष का लड़का 25
वर्ष की बहन या बुआ का बॉडी गार्ड बन कर चलता है| बिच्छू का
डंक इसी मनोबल को अर्जित करने का तरीका है-
रात भर वह बिच्छू
किसी क्रांतिकारी विचार की तरह
उसके साथ रहता
और दोनों सहानुभूति, प्यास और मित्रता में
खेलने लगते |
(लड़की, अबेकस,
पृष्ठ-26)
एक टिपिकल पारंपरिक हिंदू पत्नी पर कर्तव्याकर्तव्य का बोझ इतना अधिक लाद दिया जाता है, वह जीवन का आनंद समझ ही नहीं पाती है| पति का आतंक
पत्नी को कभी ‘रिलीफ’ का क्षण मुहय्या नहीं होने देता। यह अकारण नहीं है कि सन
1882 में ताराबाई शिंदे अपनी किताब ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ (मराठी) में कहतीं हैं कि
अधिकांश भारतीय औरत के दिमाग में
उत्पीड़न से मुक्ति के संदर्भ में एक बार पति के मरने का ख्याल जरूर आता है| सामान्य
पाठकों को इस तरह की बातें नाकाबिलेबर्दाश्त होंगी| लेकिन यह स्त्री-अनुभव है| ऋतुराज ‘वह औरत’ कविता में लिखते हैं-
मुझसे तो कहीं
बेहतर है वह विधवा पुजारिन
जिसे नित्य प्रसाद और प्रभु के दर्शन प्राप्त होते हैं
लेकिन अकेले में सुख भोगने के लिए
मंदिर होना चाहिए मेरे पास
न कि घर-कुटुंब
(वह
औरत, लीला मुखारवृंद पृष्ठ-79)
घर-कुटुम्ब के प्रति इस तरह की विरक्ति विवाह संस्था और उस
संस्था की जड़ में विन्यस्त पितृसत्ता पर
पुनर्विचार की मांग करती है|
ऋतुराज की ‘माँ’ अपनी बेटी को स्त्री शिक्षा देते हुए कहती
है कि ‘आग रोटियां सेंकने के लिए है जलने के लिए नहीं’ (कन्यादान, लीला मुखारवृंद)
लेकिन जहाँ स्वयं जलना (आत्महत्या) न हो
जहाँ लड़कियां जला दी जाती हों (हत्या) वहाँ के लिए कवि रमाशंकर यादव विद्रोही की
‘बेटी’ कहती है
पापा तुम वेबजह ही
हम लड़कियों के बारे
में इतने भावुक होते हो
हम लड़कियां तो लकड़ियां होती हैं
जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं|
(मोहनजोडरो की
आखिरी सीढी, नई खेती, नवारम्भ प्रकशन, पृष्ठ 17)
विवाहोपरांत अधिकांश पारिवारिक हिंदू लड़कियाँ या तो सीधे-सीधे चूल्हे में लगा दी जाती हैं या
वैसी ही धुएंदार सीलनदार और बदबूदार परिस्थितियों में पटक दी जाती हैं|
आजादी के समय से ही सांझी संस्कृति और साझी विरासत में दीमक
लग गई| जिस समूह ने भारतीय मुसलमानों के सैकड़ों वर्षों की भारतीय घुलावट को एक
सिरे से नकारते हुए उन्हें बाहरी कहना शुरू किया, आज वे काफी ताकतवर हैं। वे इस
बात से इनकार करते हैं कि भारतीय मुसलमान खाँटी हिन्दुस्तानी हैं| उनके बाप-दादा पूर्व में यहीं के हिंदू थे| सांप्रदायिक राजनीति ने पाकिस्तान का
वितंडा खड़ा कर हमेशा के लिए भारतीय मुसलमानों को बेगाना बना दिया। अब तो यह हाल है
कि उनके इबादत स्थलों को भी छीना जा रहा है| उनके अस्तित्व को खरोंचा और नछोरा जा
रहा है| वे आखिर जाएं तो कहाँ जाएं| ऋतुराज अपनी एक बेहद संवेदनशील लंबी कविता ‘हसरूद्दीन’
में मुसलमानों के हाशिएकरण को रेखांकित करते हैं| हसरुद्दीन एक ईमानदार और
कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक हैं। समाज शिक्षकों का सम्मान करता है, लेकिन हसमुद्दीन की
पहचान शिक्षक की नहीं एक मुसलमान की है| उनकी किस्मत में शिक्षक का सम्मान नहीं एक
मुसलमान का अपमान लिखा है-
तुम एक शिक्षित अध्यापक हो
वे कहते हैं निर्माता हो
तालीम और इल्म की रूह हो
हसरूद्दीन! तुम उस आनेवाली
बेहतरीन दुनिया की बुनियाद हो
फिर भी तुम इस मलबे में
दलदल कीचड़ काई के पोखर में
एक लारवा जैसे क्यों रहते हो?
(हसरूद्दीन, अबेकस, पृष्ठ-56)
मुसलमानों पर चौतरफा हो रही नाइंसाफियां अब खबरें नहीं बनतीं|
बने भी कैसे? न्यूज़ तो वही होता है जो ‘न्यू’ हो| मुसलमानों के साथ अन्याय-अत्याचार में
नया क्या है? ऋतुराज खबरों के इस नए ढब को भलीभाँति जानते हैं, और दुख व्यक्त करते
हैं-
लेकिन हसरुद्दीन, तुम्हारे साथ हुए इस हादसे का
कोई जिक्र इस पन्ने पर नहीं है
एक तरफा कार्रवाई में
इसकी ओर उसकी शहादत में
तुम्हारे साथ हुए इस हादसे का जिक्र
इस सफे से गायब है...
अखबार में तुम्हारे सिवा सब कुछ है|
(हसरूद्दीन, अबेकस,
पृष्ठ-59)
अखबार में ‘हसरूद्दीन’ का विलोपन और सब कुछ का होना विशेषकर
हिंदी अखबार का मर्सिया है। जिस निर्लज्जता से हिंदी अखबारों ने सत्ता की चापलूसी
में अपने को ढाल दिया है, खपा दिया है, इसे देख कर अकबर इलाहाबादी और पुराने चेतन
स्वाभिमानी पत्रकारों की आत्मा जार-बेजार रो रही होगी| ‘जब तोप मुकाबिल हो तो
अखबार निकालो’ जैसी पंक्तियाँ इतनी जल्दी पौराणिक पंक्तियों में रूपांतरित हो जाएंगी, किसे पता था?
हिंदी पत्रकारिता का अभी ‘चारण युग’ चल रहा है| प्रखर पत्रकार रवीश कुमार
इस तरह की मुख्यधारा की पत्रकारिता को यूं ही ‘गोदी मीडिया’ नहीं कहते| ऋतुराज हिंदी अखबारों
के इस दुश्चरित्र को सन 1982 में पहचान गए
थे-
आओ, अखबार के चाटुकार फरेबी,
इस सम्राट का स्तुतिगान करो
एक-एक कहे इसके आत्मवचनों को उद्धृत करो
छंदबद्ध और सस्वर|
(फिलहाल, अबेकस
पृष्ठ-83)
पत्रकारिता की यह ‘छंदोबद्धता’
और ‘सस्वरता’ काफी सांकेतिक है| कोरोना
जैसे आपातकाल और विपदा के क्षण में भी
मुसलमानों को टारगेट करने और सरकार की नाकामियों को छिपाने में मीडिया ने जिस ‘सर्जनात्मक
भाषा’ और ‘उत्साह’ का परिचय दिया वह किसी ‘छंदोबद्धता’ से कम नहीं| ऋतुराज को ऐसी ‘दिशाहीन
पत्रकारिता’ से कोई उम्मीद नहीं-
और दिशाहीन पत्रकारिता
खो जाती है सत्ता के आग्नेय नेत्रों में :
हर वक्त
जिह्वा हो या कलम
पीछे भयावह
अंधे देवता की प्रस्तुति में करती है
ना जाने कितनी
हत्याएं
न जाने कितनी निर्मम उपेक्षाएं |
(फिलहाल, अबेकस-83)
ऋतुराज समय को थाहने, सूँघने, और अकानने वाले कवि हैं| ‘कॉल से होड़’ लेने वाला कवि अपने समय की
विसंगतियो और विडंबनाओं से निरपेक्ष नहीं रह सकता| यही कारण है कि उनकी कविता में
राजनीतिक पैनापन जानलेवा है| ऋतुराज अपनी बहुत कम कविता में सीधे-सीधे राजनीति से
जूझते हैं, लेकिन उनकी अधिकांश कविताएँ राजनीतिक चेतना से लैस होती हैं। जिन लोगों
के लिए ऋतुराज कविता लिख रहे होते हैं वे जानते
हैं कि उनकी दुर्दशा का मूल कारण राजनीति है। इसलिए वे लगातार कविता की
व्यंजनाधर्मिता से राजनीति से ‘पंगा’ लेते हैं|
वे राजनीति से ‘पंगा’ लेने के खतरे
से वाकिफ हैं| इसलिए उनकी पहचान एक साहसिक
कवि की है| सरकार अपनी असफलता और नाकामियां बहुत साफगोई से जनता पर ही थोप देती है|
उदाहरण के लिए सरकार का आरोप है कि चूँकि किसान ऋण का समायोजन नहीं कर पाते हैं, इसलिए
आत्महत्याएं करते हैं| लेकिन सरकार जब जनता का समायोजन नहीं कर पाती है तो
आत्महत्या नहीं करती| ऋतुराज सरकार की इन
चालाकियों को हमसे साझा करते हैं-
कल देश जान जायेगा
कि गरीब की चमड़ी के लिए
कौन-सा दल सही नाप के कपड़े पहनायेगा
कौन देगा उसके मुँह में निवाला
बाढ़ और अकाल से
मुक्ति दिलानेवाला देवता कौन होगा ? ?
और अगर देवी कुपित हुईं
तो
कौन इसका दोष जनता के मत्थे मढेगा ? ? ?
(कौन, पुल पर पानी पृष्ठ-22)
ऋतुराज अपने मारक राजनीतिक व्यंग्य से मदांध विजयी सरकार को एक ही झटके में धम्म से जमीन पर
गिरा देते हैं-
तुम धरती स्वीकार करते हो
विजित करते हो जनपद पर जनपद
लेकिन अज्ञान निर्धनता और बिमारी के ही तो राजा हो
(राजधानी
में, पुल पर पानी, पृष्ठ-13)
संयोगात ये पंक्तियाँ वर्तमान अहंकारी सरकार पर शत-प्रतिशत
लागू होती है|
कविता हो या जीवन ‘पूर्णता’ और ‘सही’ की तलाश निरंतर की
जाती रही है| लेकिन हम जानते हैं कि ‘पूर्णता’ अपने आप में छद्म है| ‘अधूरापन’ और ‘गलतियाँ’
ही जीवन की सचाई है| अधूरेपन और गलतियों के
बीच में ही कहीं ज़िंदगी का रहस्य छिपा
होता है| बावजूद पूर्णता के पीछे सभी बेकल रहते हैं| ऋतुराज इस ‘अधूरेपन’ और छोटी-छोटी गलतियों के महात्म्य से
हमारा परिचय कराते हैं-
अगर पहले बनी वस्तुओं में नया-नया अधूरापन नहीं भरता
और जो संभव नहीं हो सका उसे ही सही-सही
दर्ज कर लिया जाता
अगर गलतियों के इतिहास से भी धरती पर नये रूप बनते
जो शायद इतने अधूरे नहीं होते
अगर ज्यादा अधूरे होते तो...
(अगर की कविता, लीला मुखारवृंद, पृष्ठ-9)
कवि ऋतुराज दृढ़ संकल्पित हैं कि ‘अब सब कुछ मूर्त होगा’| इसका
कारण बतलाते हुए वे अपनी कविता ‘गर्भवती कवयित्री’
में लिखते हैं-
‘क्योंकि अमूर्तन की भाषा में बहुत समय तक नहीं हो सकती कविता’|
(गर्भवती कवयित्री, लीला मुखारवृंद, पृष्ठ-35)
सैद्धांतिक रूप से तो ऋतुराज की बात सही है, क्योंकि
अमूर्तन विषयवस्तु को उलझता ही नहीं है बल्कि भटकाता भी है। आमजन को अमूर्तन की भाषा समझने में कठिनाई होती
है| ‘काव्यविलास’ के लिए या कविता को
दर्शन की उंचाई तक ले जाने के लिए तो अमूर्तन का औचित्यीकरण किया जा सकता है लेकिन
जनकवि के लिए अमूर्तन उचित नहीं। कठिनाई यह है कि ऋतुराज जनकवि हैं और अमूर्तन को
कविता के लिए उचित नहीं मानते| बावजूद
उनकी बहुत सारी कविताएं अमूर्तन में चली जाती हैं, जिन्हें आम लोगों के लिए समझना
काफी कठिन हो जाता है| उदाहरण के लिए उनकी कविता ‘ऋतु’ को लें-
मरे हुए जीवन के मरे हुए जीवन के
मरे हुए जीवन का एक लड़का
हवा में फूलों की चोरी करता
हुआ देखा गया पानी
जलता गया
उसने कुछ पत्ते तोड़े और समय का
चेहरा ढक दिया
कई बार
वह चेहरा हँसा और खामोश
हो गया
फिर लड़के ने बातें बदलीं और
रुके हुए पानी के पास
एक ठूँठ के पीछे छिप गया
(ऋतु, एक मरणधर्मा एवं अन्य, 1967, पृष्ठ-84)
यह तो एक उदाहरण मात्र है| इस संग्रह मैं कई कविताएं
अमूर्तन में सैर करती हैं, जिसका ओर-छोर खोज पाना सहज नहीं| इस संग्रह में ‘साधारण’
विषयों पर ‘असाधारण’ कविताएँ लिखी गई हैं| यह अच्छी बात है कि ऋतुराज अपनी बाद की कविताओं में अमूर्तन को बहुत हद
तक छोड़ देते हैं| ऋतुराज अपनी कविताओं में गाहे-बगाहे कविता की शिल्प-संरचना और
भाषा पर भी विचार व्यक्त करते चलते हैं-
इस जोखिम भरे रास्ते पर
हो सकता है कोई मुहावरा अपनी जान गंवा बैठे|
अब शब्दों की मुलायम बुनावट का वक्त
खत्म हुआ...
(दीवार से दूर, अबेकस, पृष्ठ-85)
कई संस्कृत आचार्यों ओर कविता को कामिनी तथा ‘कोमलकांत
पदावली’ (नीरस तरुतरि विलसित पुरतः) मानने
वालों के लिए भले कविता के लिए मुलायम शब्द की अपरिहार्यता हो किंतु रुखे यथार्थ
और कठोर सचाई के लिए तो रुखे और कठोर शब्द ही सार्थक और सर्जनात्मक हो सकते हैं (शुष्कोवृक्षस्तिष्ठत्यग्र)| वृक्ष की
यथार्थता को तो यही श्लोक बताने में समर्थ है|
ऋतुराज अपनी कविताओं में अछूते बिम्ब और उपमा-उपमान लाते हैं| ख़ास बात यह है कि ये बिम्ब और उपमाएँ
सामान्य जनजीवन से उठाये गए होते हैं| लेकिन कवि अपने नये कहन-शैली से उसमें सर्वथा
अलग अर्थ सन्दर्भ भर देते हैं| ‘पुल
पर पानी’ संग्रह में ही देखें तो धूप से कजलाये मैदान (हॉलीहाक), रेशों से बने
किरणों के चाबुक (तुम्हारे भीतर से रचने के लिए), बीमार सुर्ख मुस्कान (वह), ममत्व
की सुहानी धूप (माँ), तितली की तरह उसकी भाषा (मुक्तिबोध), मरी हुई नीलगाय की-सी आँखें (लड़का), कुचली हुई हरकत, डूबती
हुई-सी हलचल (पारिस्थितिकी), छिली हुए चमड़ी की फुसफुसाहट ( ज़िन्दा चाहिए) और बित्तेभर धूप की टुकड़े जैसा आदि-आदि| ऋतुराज बहुत
सारा अनकहा संकेत चिन्हों से कह देते हैं| यहाँ तक कि रिक्त
स्थान से भी, दो शब्दों और दो वाक्यों से
बीच अतिरिक्त छूटे स्पेस से भी| इनकी कविता में एक नहीं बल्कि दो-दो और तीन-तीन प्रश्नवाचक
चिह्न होते हैं| ये चिह्न मात्र प्रयोग के लिए या चमत्कार के
लिए नहीं हैं बल्कि इन चिह्नों के विशेष मतलब हैं| ये संकेत
चिह्न कविता को अर्थवान बनाते हैं|
ऋतुराज की अधिकांश कविताएँ दरअसल शोकगीत हैं, उन वंचितों और
उपेक्षितों के जो आज भी बेहतरी की आस लगाए
बैठे हैं| अरुंधति राय ने ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस’ में लिखा है कि-
एक शोकगीत आप कैसे सुनते हैं
उस शोकगीत का हर एक पात्र बनकर
नहीं
एक शोकगीत में शामिल हर चीज बनकर|
(बया के ऋतुराज विशेषांक में प्रकाशित)
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